हरेली की हरियाली पर आधुनिकता की मार! फीकी पड़ रही छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा, विलुप्ति के कगार पर पहुंची गेड़ी कभी गांव-गांव गूंजती थी गेड़ी की धमक, आज गलियों में ढूंढे नहीं मिलते गेड़ी पर दौड़ते बच्चे — मोबाइल और आधुनिकता ने बदली हरेली की तस्वीर

रिपोर्टर :- अनीश सोलंकी
गरियाबंद । छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी माटी, खेती-किसानी, लोकगीत, लोकनृत्य और सदियों पुरानी परंपराओं से है। इन्हीं परंपराओं में हरेली तिहार का विशेष स्थान है। कभी हरेली का नाम आते ही गांवों में उत्साह की लहर दौड़ जाती थी। घर-आंगन सजते थे, किसान अपने कृषि औजारों की पूजा करते थे, पशुधन को सजाया जाता था और गांव की गलियों में बच्चों की गेड़ी दौड़ से पूरा माहौल जीवंत हो उठता था। लेकिन बदलते समय के साथ अब हरेली की वह पुरानी रौनक धीरे-धीरे धुंधली पड़ती नजर आ रही है।
जिस गेड़ी को कभी हरेली की सबसे बड़ी पहचान माना जाता था, आज वही गेड़ी गांवों में भी मुश्किल से नजर आती है। इस बार हरेली के मौके पर छुरा क्षेत्र के गांवों में बहुत कम बच्चे गेड़ी पर चढ़ते दिखाई दिए। कई जगह तो गेड़ी का नाम लेने वाला तक कोई नहीं था। कभी जिन गलियों में बच्चों की टोलियां गेड़ी लेकर निकलती थीं, वहां अब मोबाइल फोन, इंटरनेट और आधुनिक मनोरंजन ने अपनी जगह बना ली है।
गेड़ी की धमक से गुलजार होते थे गांव
एक समय था जब हरेली से कई दिन पहले ही गांवों में गेड़ी बनाने की तैयारी शुरू हो जाती थी। बच्चे बांस की गेड़ी तैयार करवाने के लिए उत्साहित रहते थे। हरेली के दिन सुबह से ही बच्चे रंग-बिरंगी गेड़ी लेकर घरों से निकलते और गांव की गलियों में दौड़ लगाते थे। गेड़ी पर सबसे ऊंचा चढ़कर कौन ज्यादा देर तक चल सकता है, कौन सबसे तेज दौड़ सकता है, इसे लेकर बच्चों में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा रहती थी।
गांव के बुजुर्ग चौपालों में बैठकर बच्चों की गेड़ी दौड़ देखते थे और उनकी हौसला अफजाई करते थे। कई स्थानों पर गेड़ी दौड़ प्रतियोगिताएं आयोजित होती थीं। पूरा गांव एक परिवार की तरह इस उत्सव में शामिल होता था। लेकिन अब यह दृश्य धीरे-धीरे अतीत की तस्वीर बनता जा रहा है।
मोबाइल युग में खोता बचपन, सिमटती लोक संस्कृति
बदलते दौर ने बच्चों के मनोरंजन के साधन भी बदल दिए हैं। पहले बच्चे मैदान, चौपाल और गांव की गलियों में खेलते थे, लेकिन अब मोबाइल गेम, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने बच्चों के खाली समय का बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में ले लिया है।
इसका सीधा असर हमारी पारंपरिक संस्कृति पर भी दिखाई दे रहा है। गेड़ी, भौंरा, गिल्ली-डंडा, कबड्डी, खो-खो जैसे कई पारंपरिक खेलों से नई पीढ़ी का जुड़ाव लगातार कम होता जा रहा है। परिणाम यह है कि जिन परंपराओं को कभी गांव की पहचान माना जाता था, वे अब धीरे-धीरे सिमटती जा रही हैं।
हरेली सिर्फ त्योहार नहीं, छत्तीसगढ़ की आत्मा है
हरेली तिहार केवल एक धार्मिक या कृषि पर्व नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन और कृषि संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। किसान इस दिन कृषि औजारों की पूजा करते हैं और अच्छी फसल की कामना करते हैं। पशुधन के प्रति सम्मान भी इस पर्व की महत्वपूर्ण परंपरा है।
हरेली के साथ जुड़े पारंपरिक पकवान, लोकगीत, खेल और गेड़ी इस पर्व को बाकी त्योहारों से अलग पहचान देते हैं। यही वजह है कि हरेली की परंपराओं का संरक्षण केवल एक त्योहार को बचाना नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक विरासत और सांस्कृतिक पहचान को बचाना है।
नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने की जरूरत
बुजुर्गों का कहना है कि यदि बच्चों को पारंपरिक खेलों और त्योहारों से नहीं जोड़ा गया तो आने वाले वर्षों में कई लोक परंपराएं पूरी तरह समाप्त हो सकती हैं। स्कूलों, ग्राम पंचायतों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से हरेली के अवसर पर गेड़ी दौड़, कबड्डी, खो-खो और अन्य पारंपरिक खेलों की प्रतियोगिताएं आयोजित की जानी चाहिए।
गांवों में बच्चों को गेड़ी बनाने और चलाने की कला सिखाई जाए। बुजुर्गों के अनुभव और नई पीढ़ी के उत्साह को जोड़कर इस परंपरा को फिर से जीवंत किया जा सकता है।
कहीं ऐसा न हो कि तस्वीरों में रह जाए गेड़ी
आज जरूरत इस बात की है कि हरेली को सिर्फ सरकारी कार्यक्रमों और औपचारिक आयोजनों तक सीमित न रखा जाए। इसकी असली पहचान गांव की मिट्टी, बच्चों की हंसी, गेड़ी की धमक, पारंपरिक खेलों और छत्तीसगढ़ी व्यंजनों में है।
अगर समय रहते गेड़ी और अन्य लोक परंपराओं को बचाने के लिए ठोस प्रयास नहीं किए गए तो वह दिन दूर नहीं जब नई पीढ़ी गेड़ी को केवल किताबों, सोशल मीडिया की तस्वीरों या बुजुर्गों की कहानियों में ही देखेगी।
कभी हरेली के दिन गांव की गलियां गेड़ी की धमक से गूंजती थीं, आज उन्हीं गलियों में खामोशी नजर आती है। सवाल सिर्फ गेड़ी के गायब होने का नहीं, बल्कि हमारी उस लोक संस्कृति का है जो धीरे-धीरे आधुनिकता की भीड़ में अपना अस्तित्व खोती जा रही है।
बड़ी चिंता : परंपरा बची तो हरेली की पहचान बचेगी
हरेली की असली रौनक तभी लौटेगी, जब त्योहार सिर्फ कैलेंडर की तारीख न रहकर फिर से गांव के सामूहिक जीवन का हिस्सा बने। गेड़ी फिर बच्चों के कंधों पर दिखाई दे, चौपालों में पारंपरिक खेलों की चर्चा हो और छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की खुशबू फिर घर-घर तक पहुंचे—तभी हरेली की वह पुरानी पहचान वापस लौट सकेगी।
वरना आने वाले समय में इतिहास यही कहेगा—कभी छत्तीसगढ़ की हरेली में गेड़ी दौड़ा करती थी।
