नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर BRC ने अपने चहेते को थमाया दो संकुलों का प्रभार,योग्य शिक्षकों को दरकिनार कर मनमानी नियुक्ति, मीडिया सवालों पर बौखलाए अधिकारी

मैनपुर :- गरियाबंद जिले के शिक्षा विभाग में नियम-कायदों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। अधिकारियों की मनमानी इस कदर हावी है कि अब नियुक्तियाँ नियम से नहीं, बल्कि “पसंद–नापसंद” से तय हो रही हैं। इसका ताजा और जीता-जागता उदाहरण मैनपुर विकासखंड के बीआरसी कार्यालय से सामने आया है, जहां नियमों को ताक पर रखकर एक ही संकुल समन्वयक को दो-दो संकुलों का प्रभार दे दिया गया।
नियम कुछ और, फैसला कुछ और!
दरअसल, भाठीगढ़ संकुल के लिए संकुल समन्वयक की नियुक्ति होनी थी। नियम साफ कहते हैं कि जिस संकुल के लिए नियुक्ति हो, उसी संकुल क्षेत्र के शिक्षक को समन्वयक बनाया जाना अनिवार्य है।
इस पद के लिए भाठीगढ़ संकुल क्षेत्र के दो योग्य शिक्षकों—
शंकरलाल कंवर, मिडिल स्कूल आश्रम शाला गोबरा
सुरेश कुमार सागर, प्राथमिक शाला काटीदादर
ने विधिवत आवेदन बीआरसीसी कार्यालय में प्रस्तुत किया था।
योग्यता को नकार, चहेते को उपहार
लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि बीआरसी नागे ने इन दोनों में से किसी को भी नियुक्त नहीं किया। इसके बजाय पहले से ही पदस्थ दामोदर साय नेगी (संकुल समन्वयक मैनपुर–2) को ही भाठीगढ़ संकुल का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया, जो सीधे-सीधे नियमों का उल्लंघन है।
मीडिया के सवालों पर घबराए अधिकारी, गढ़ी मनगढ़ंत कहानी
जब इस मामले में मीडिया ने बीआरसी नागे से सवाल किया, तो वे पहले हड़बड़ा गए, फिर गोलमोल और तर्कहीन जवाब देने लगे।
बीआरसी का कहना था—
“गोबरा गांव के शिक्षक ने आवेदन दिया था, लेकिन वहां के लोग छोटी-छोटी बातों पर आंदोलन करते हैं, इसलिए वहां के शिक्षक को संकुल समन्वयक नहीं बनाया गया।”
यह बयान न केवल असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है, बल्कि यह भी साबित करता है कि अधिकारी जनता की आवाज से डरकर नियमों को कुचल रहे हैं।
‘सब जगह यही चल रहा है’—कानून तोड़ने की खुली स्वीकारोक्ति!
जब मीडिया ने नियम तोड़ने पर सीधा सवाल दागा, तो बीआरसी नागे ने और भी चौंकाने वाला बयान दिया—
“यहां 6 संकुलों में इसी तरह दूसरे संकुल के शिक्षकों को प्रभार दिया गया है, सब चल रहा है।”
यानी साफ है कि पूरे विकासखंड में नियमों की सुनियोजित हत्या की जा रही है, और जिम्मेदार अधिकारी इसे “सामान्य प्रक्रिया” बताकर बचने की कोशिश कर रहे हैं।
नियम नहीं मानने तो बनाए ही क्यों गए?
अब सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासन से है—
जब नियमों का पालन ही नहीं करना है, तो फिर नियम बनाए क्यों जाते हैं?
क्या शिक्षा विभाग अब पूरी तरह अराजकता और अफसरशाही की जागीर बन चुका है?
जनप्रतिनिधियों में भारी आक्रोश, जांच की मांग
इस पूरे मामले को लेकर जनप्रतिनिधियों में जबरदस्त आक्रोश व्याप्त है। उन्होंने जिला प्रशासन से—
निष्पक्ष जांच
दोषी अधिकारी पर सख्त कार्रवाई
की मांग की है।
अब आंदोलन या कार्रवाई—फैसला प्रशासन के हाथ
अब देखना यह है कि
मामला उजागर होने के बाद जिला प्रशासन जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करता है या फिर एक बार फिर जनता को सड़क पर उतरकर आंदोलन करने पर मजबूर किया जाएगा।
शिक्षा विभाग में नियमों की हत्या और अफसरों की मनमानी कब रुकेगी—यह सवाल अब पूरे जिले में गूंजने लगा है।

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