नियमों की अवहेलना या पद का दुरुपयोग?,संकुल समन्वयक अतिरिक्त प्रभार मामला : नियम, जिम्मेदारी और जवाबदेही

मैनपुर :- रिपोर्ट अनीश सोलंकी
मैनपुर विकासखंड में संकुल समन्वयक के अतिरिक्त प्रभार का मामला केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि नियमों की खुली अवहेलना और पद के संभावित दुरुपयोग की ओर इशारा करता है। मामले मे समाचार प्रकाशन के बाद जिला परियोजना समन्वयक द्वारा बीआरसी को नोटिस जारी किया जाना इस बात का प्रमाण है कि मामला गंभीर और प्रथम दृष्टया अनियमित पाया गया है।
संकुल समन्वयक नियुक्ति के स्पष्ट कानूनी प्रावधान
1. समग्र शिक्षा के दिशा-निर्देश
समग्र शिक्षा (Samagra Shiksha) के अंतर्गत जारी मार्गदर्शिका के अनुसार—
प्रत्येक संकुल में एक नियमित संकुल समन्वयक की नियुक्ति अनिवार्य है
संकुल समन्वयक की नियुक्ति उसी संकुल क्षेत्र के पात्र शिक्षक में से की जाएगी
अतिरिक्त प्रभार केवल अस्थायी और अपरिहार्य परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है
मैनपुर प्रकरण में न तो अपरिहार्य स्थिति स्पष्ट की गई और न ही पात्र शिक्षकों की चयन प्रक्रिया अपनाई गई।
2. छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग के निर्देश
राज्य शिक्षा विभाग के परिपत्रों के अनुसार
संकुल समन्वयक पद प्रशासनिक सहूलियत नहीं, बल्कि शैक्षणिक जिम्मेदारी का पद है
किसी एक शिक्षक को एक से अधिक संकुलों का दीर्घकालीन प्रभार देना नियम विरुद्ध है
चयन में पारदर्शिता और दस्तावेजी प्रक्रिया अनिवार्य है
भाठीगढ़ संकुल में यह सभी शर्तें नजरअंदाज की गईं।
3. छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम, 1965
इन नियमों के तहत
कोई भी शासकीय सेवक पद का दुरुपयोग कर किसी व्यक्ति को अनुचित लाभ नहीं पहुंचा सकता
मनमाने निर्णय से शासन की छवि धूमिल होना भी अनुशासनात्मक अपराध है
चहेते को अतिरिक्त प्रभार देना इस नियम के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है।
4. भारतीय दंड संहिता (IPC) का संभावित पहलू
यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि
योग्य शिक्षकों को जानबूझकर दरकिनार किया गया
नियमों की अनदेखी कर विशेष व्यक्ति को लाभ दिया गया
तो यह
IPC की धारा 166 (लोक सेवक द्वारा विधि की अवहेलना)
धारा 167 (गलत दस्तावेज तैयार कर लाभ पहुंचाना, यदि लागू हो)
के अंतर्गत भी विचारणीय हो सकता है।
नोटिस का कानूनी महत्व
जिला परियोजना समन्वयक द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस यह दर्शाता है कि
प्रथम दृष्टया नियमों का उल्लंघन पाया गया है
संतोषजनक जवाब न मिलने पर
अतिरिक्त प्रभार निरस्त
विभागीय जांच
अनुशासनात्मक कार्रवाई
तक की संभावना बनती है।
मीडिया की भूमिका और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी
यह मामला एक बार फिर सिद्ध करता है कि जब प्रशासनिक तंत्र मौन रहता है
तब मीडिया लोकतंत्र का प्रहरी बनकर नियमों की रक्षा करता है
समाचार प्रकाशित न होता, तो संभवतः यह अनियमितता दबी रह जाती।
अब सबसे बड़ा सवाल
क्या दोषियों पर वास्तविक कार्रवाई होगी?
या फिर जवाब लेकर मामले को औपचारिकता में निपटा दिया जाएगा?
क्या योग्य शिक्षकों को उनका वैधानिक अधिकार मिलेगा?
निष्कर्ष
संकुल समन्वयक अतिरिक्त प्रभार का यह मामला केवल मैनपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा विभाग में व्याप्त प्रशासनिक मनमानी का प्रतीक बनता जा रहा है। यदि समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो नियम केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएंगे।
अब निर्णय प्रशासन के हाथ में है
नियमों की जीत होगी या रसूख की?
