छुरा बीईओ की मनमानी का मामला गरमाया — एक ही कर्मचारी को दो स्थानों की जिम्मेदारी, 60 किलोमीटर की दूरी पर कैसे निभाएगा दोनों जगह की ड्यूटी? रिपोर्टर- अनीश सोलंकी 

छुरा :- विकास खंड शिक्षा कार्यालय छुरा में एक बार फिर नियमों को ताक पर रखकर आदेश जारी किए जाने का मामला सामने आया है। इस बार बीईओ (खंड शिक्षा अधिकारी) द्वारा की गई एक चौंकाने वाली कार्यवाही ने शिक्षकीय व्यवस्थाओं और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

दरअसल, छुरा बीईओ द्वारा जारी आदेश क्रमांक 0648/वि.ख.शि.अ./स्था./2025 दिनांक 15 जुलाई 2025 के अनुसार, श्री संतोष कुमार साहू सहा.शि.एल.बी., जो वर्तमान में संकुल समन्वयक के रूप में संकुल केंद्र रुवाड में कार्यरत हैं, उन्हें पाण्डुका संकुल का अतिरिक्त प्रभार भी सौंप दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि रुवाड और पाण्डुका के बीच लगभग 60 किलोमीटर की दूरी है, और दोनों स्थानों में समुचित कार्य संचालन के लिए समर्पित समय और उपस्थिति की आवश्यकता होती है।

शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार, एक संकुल समन्वयक को एक ही केंद्र की जिम्मेदारी दी जाती है ताकि वह शालाओं के संचालन, निरीक्षण, शैक्षणिक गुणवत्ता और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पूर्ण योगदान दे सके। लेकिन इस मामले में एक ही व्यक्ति को दो अलग-अलग और दूरस्थ संकुलों की जिम्मेदारी देकर न सिर्फ शासन के दिशा-निर्देशों की अवहेलना की गई है, बल्कि इससे शिक्षा व्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

सेटिंग का खेल या अनदेखी?
स्थानीय लोगों और शिक्षकों का आरोप है कि यह फैसला ‘सेटिंग’ और सुविधा आधारित है, न कि योग्यता और आवश्यकता के आधार पर। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि एक व्यक्ति यदि दोनों स्थानों पर कार्य नहीं कर पाता तो क्या वह दोनों जगह से वेतन लेगा? यह सीधा तौर पर सरकारी धन का दुरुपयोग माना जाएगा।

जिम्मेदार कौन?
क्या बीईओ कार्यालय ने इस आदेश को जारी करते समय दोनों केंद्रों की भौगोलिक स्थिति, यातायात की सुविधा, कार्यभार की गंभीरता और प्रशासनिक व्यावहारिकता को नजरअंदाज कर दिया? या फिर यह निर्णय किसी अंदरूनी “मैनेजमेंट” का परिणाम है?

इस मामले को लेकर स्थानीय शिक्षकों और अभिभावकों में रोष है। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था की नींव को इस प्रकार के ‘प्रबंधन आधारित फैसलों’ से कमजोर किया जा रहा है। कई शिक्षक संगठनों ने जिला शिक्षा अधिकारी और कलेक्टर से इस आदेश की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है और आदेश को तत्काल निरस्त करने की मांग उठाई है।

गरियाबंद जिले के शिक्षा प्रशासन में इस प्रकार की मनमानी नीतियां यदि इसी तरह जारी रहीं, तो इसका असर सीधे तौर पर विद्यालयों की गुणवत्ता, बच्चों की पढ़ाई और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर पड़ेगा। शासन को चाहिए कि वह इस तरह के आदेशों की समीक्षा कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई करे, ताकि शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित हो सके।

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