आवास से बाहर, राशन में कटौती, पानी के लिए जंग” सिस्टम की मार झेल रही विधवा, प्रशासन पर उठे बड़े सवाल

रिपोर्टर :- अनीश सोलंकी
छुरा।ग्राम पंचायत सेमरा की एक मार्मिक कहानी अब पूरे इलाके में गूंज रही है—जहां एक विधवा की जिंदगी सरकारी योजनाओं की पोल खोल रही है। माहेतरीन बाई, उम्र करीब 50 साल, जिनके सिर से सात साल पहले पति बीरबल गोंड का साया उठा, आज भी अपने हक के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
जहां एक तरफ सरकार गरीबों को पक्का मकान, भरपूर राशन और घर-घर पानी देने के दावे करती है, वहीं हकीकत में माहेतरीन बाई जैसे लोग आज भी इन बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर हैं। उनका कच्चा खपरेल मकान हर मौसम में उनकी मजबूरी और सिस्टम की नाकामी का सबूत बन चुका है।
“आवास योजना बनी मजाक, नाम तक नहीं जुड़ा”
गांव में कई लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिल चुका है, लेकिन सबसे जरूरतमंद माहेतरीन बाई आज भी सूची से बाहर हैं। बरसात में टपकती छत और गर्मी में झुलसता घर—यही उनकी जिंदगी की सच्चाई है।
“35 किलो से 20 किलो—राशन में कटौती ने बढ़ाई मुश्किल”
पहले मिलने वाला 35 किलो राशन अब घटकर 20 किलो रह गया है। सवाल यह उठता है कि आखिर किस आधार पर उनके हक में कटौती की गई? क्या गरीबों का हक यूं ही छीना जाएगा?
“नल योजना कागजों में, पानी के लिए रोज जंग”
गांव में नल कनेक्शन पहुंचने के दावे हैं, लेकिन माहेतरीन बाई को आज भी दूर से पानी ढोना पड़ रहा है। उम्र के इस पड़ाव में सिर पर मटका उठाकर लंबी दूरी तय करना उनकी मजबूरी बन चुका है।
प्रशासन पर उठे सवाल
माहेतरीन बाई का साफ आरोप है कि पंचायत के जिम्मेदार लोग उनकी समस्याओं को नजरअंदाज कर रहे हैं। कई बार शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि कहीं न कहीं सिस्टम में गंभीर खामियां हैं—या फिर जानबूझकर अनदेखी की जा रही है।
ग्रामीणों का गुस्सा फूटा
गांव के लोगों में इस मामले को लेकर भारी नाराजगी है।
एक ग्रामीण ने कहा, “जिन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है, वही योजना से बाहर हैं—यह सीधा अन्याय है।”
एक अन्य ग्रामीण बोले, “अगर ऐसे ही चलता रहा तो सरकारी योजनाओं पर से लोगों का भरोसा उठ जाएगा।”
महिलाओं का कहना है, “आज माहेतरीन बाई हैं, कल हम भी हो सकते हैं—प्रशासन को जागना होगा।”
बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?
यह मामला सिर्फ एक महिला की परेशानी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।
क्या योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएंगी?
क्या जरूरतमंदों को उनका हक दिलाने वाला कोई नहीं?
अब नजर प्रशासन पर
माहेतरीन बाई ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच और न्याय की मांग की है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले को गंभीरता से लेते हैं या फिर यह कहानी भी फाइलों में दबकर रह जाएगी।
यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ एक सच्ची आवाज है—जो अब दबने वाली नहीं।
