प्रश्नपत्र वायरल, परीक्षा व्यवस्था पर बवाल! नादिर कुरैशी बोले—“बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ बंद करे विभाग”,पहली से पांचवीं की परीक्षा स्थगित, छठवीं से आठवीं के कथित वायरल प्रश्नपत्रों पर चुप्पी क्यों? 10 बजे परीक्षा और 10 बजे ही PDF भेजने की प्रक्रिया पर उठाए सवाल

गरियाबंद। जिले में परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र सोशल मीडिया पर वायरल होने के मामले ने शिक्षा विभाग की परीक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहली से पांचवीं तक की परीक्षा स्थगित किए जाने के बाद छठवीं से आठवीं के कथित वायरल प्रश्नपत्रों को लेकर अलग स्थिति सामने आने से सवाल और गहरा गए हैं। वहीं शासन की मूल्यांकन व्यवस्था संबंधी आदेश और जिला शिक्षा अधिकारी की ओर से सामने आए कथित बयान के बीच अंतर को लेकर भी चर्चा तेज है।
मामले में पूर्व कांग्रेस जिला महामंत्री नादिर कुरैशी ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि परीक्षा जैसी संवेदनशील व्यवस्था में प्रश्नपत्र की गोपनीयता और परीक्षा संचालन दोनों को लेकर गंभीरता जरूरी है। उन्होंने सवाल उठाया कि प्रश्नपत्र वायरल होने के बाद भी यदि वही प्रक्रिया जारी है, तो विभाग ने आखिर इससे क्या सबक लिया?
“प्रश्नपत्र वायरल हुआ, व्यवस्था फिर भी वही—तो कार्रवाई किस बात की?”
कुरैशी ने दावा किया कि वर्तमान में भी प्रश्नपत्र पीडीएफ (PDF) के माध्यम से संस्था प्रमुखों के व्हाट्सऐप पर भेजे जा रहे हैं और उसका प्रिंट निकालकर परीक्षा कराने के निर्देश दिए जा रहे हैं। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया के समय-निर्धारण पर तीखा सवाल उठाया।
उनका कहना है कि यदि सुबह 10 बजे परीक्षा शुरू होनी है और उसी समय के आसपास संस्था प्रमुखों को प्रश्नपत्र व्हाट्सऐप पर भेजा जाता है, तो संस्था प्रमुख प्रश्नपत्र डाउनलोड करने, प्रिंट निकालने और उसके बाद विद्यार्थियों को परीक्षा कक्ष में प्रश्नपत्र वितरित करने की प्रक्रिया कैसे पूरी करेंगे?
“सुबह 10 बजे परीक्षा का समय है और 10 बजे के आसपास ही संस्था प्रमुखों को प्रश्नपत्र भेजे जाएंगे। पहले PDF डाउनलोड होगी, फिर प्रिंट निकलेगा और उसके बाद विद्यार्थियों को पेपर दिया जाएगा। आखिर परीक्षा समय पर कैसे शुरू होगी? क्या विभाग ने परीक्षा संचालन की बुनियादी प्रक्रिया तक पर गंभीरता से विचार किया है?”
कुरैशी ने कहा कि जब प्रश्नपत्र की गोपनीयता को लेकर विवाद पहले ही सामने आ चुका है, तब भी पीडीएफ और व्हाट्सऐप के माध्यम से प्रश्नपत्र भेजने की प्रक्रिया जारी रहना अपने आप में सवाल खड़े करता है।
“अगर यही प्रक्रिया सुरक्षित है तो फिर प्रश्नपत्र वायरल कैसे हुआ?
और अगर यह प्रक्रिया सुरक्षित नहीं है तो इसे बदला क्यों नहीं गया?
विभाग को विद्यार्थियों और अभिभावकों के सामने इसका सीधा जवाब देना चाहिए।”
“बच्चे विभाग की लापरवाही का खामियाजा भुगतने के लिए नहीं”
नादिर कुरैशी ने कहा कि बच्चे पूरे साल मेहनत कर परीक्षा की तैयारी करते हैं। परीक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह की गड़बड़ी या अव्यवस्था का असर सीधे विद्यार्थियों पर पड़ता है।
“बच्चे विभाग की लापरवाही का खामियाजा भुगतने के लिए नहीं हैं। उनके भविष्य के साथ प्रयोग बंद होना चाहिए। प्रश्नपत्र कहां से निकला, किसके माध्यम से पहुंचा, किस स्तर पर सुरक्षा में चूक हुई और वायरल होने के बाद व्यवस्था में क्या बदलाव किया गया—इन सभी सवालों का जवाब सामने आना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि यदि वायरल प्रश्नपत्र वास्तविक थे तो यह पता लगाया जाना चाहिए कि परीक्षा से पहले वे बाहर कैसे पहुंचे और यदि वे वास्तविक नहीं थे तो विभाग को आधिकारिक जांच के जरिए स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
पहली से पांचवीं की परीक्षा स्थगित, छठवीं से आठवीं के लिए अलग मापदंड क्यों?
कुरैशी ने पहली से पांचवीं की परीक्षा स्थगित किए जाने और छठवीं से आठवीं के कथित वायरल प्रश्नपत्रों को लेकर अलग स्थिति पर भी सवाल उठाया।
“एक ही जिले में परीक्षा व्यवस्था के लिए अलग-अलग पैमाने क्यों? जब प्रश्नपत्र की गोपनीयता को लेकर पहली से पांचवीं की परीक्षा स्थगित की जा सकती है तो छठवीं, सातवीं और आठवीं के कथित वायरल प्रश्नपत्रों को लेकर अलग रुख क्यों?
विद्यार्थियों के भविष्य के मामले में ‘चलता है’ वाली मानसिकता नहीं चलेगी।”
उन्होंने कहा कि परीक्षा व्यवस्था में सभी विद्यार्थियों के लिए समान मानदंड और पारदर्शी प्रक्रिया होनी चाहिए। किसी भी विद्यार्थी को ऐसी प्रशासनिक स्थिति का नुकसान नहीं होना चाहिए, जिसमें उसकी कोई भूमिका नहीं है।
शासन का आदेश कुछ और, अधिकारी का बयान कुछ और—स्थिति स्पष्ट करे विभाग
मूल्यांकन व्यवस्था को लेकर भी कुरैशी ने शासनादेश और जिला स्तर से सामने आए कथित बयानों के बीच स्थिति स्पष्ट करने की मांग की।
“शासन का आदेश क्या कहता है, जिला शिक्षा अधिकारी क्या कह रहे हैं और स्कूलों में वास्तव में क्या लागू किया जा रहा है—अगर इन तीनों में अंतर है तो भ्रम दूर करने की जिम्मेदारी विभाग की है।
लिखित आदेश सामने रखिए और स्थिति स्पष्ट कीजिए। विद्यार्थियों का भविष्य मौखिक बयानों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।”
उन्होंने कहा कि यदि शासन के आदेश में त्रैमासिक और छमाही परीक्षा के अंकों को निर्धारित अनुपात में वार्षिक मूल्यांकन में शामिल करने का प्रावधान है, तो जिला स्तर पर इसके विपरीत कही जा रही बातों का आधार भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
“सिर्फ परीक्षा स्थगित करने से मामला खत्म नहीं होगा”
कुरैशी ने कहा कि प्रश्नपत्र वायरल होने के मामले में केवल परीक्षा स्थगित करना पर्याप्त नहीं है। पूरी प्रक्रिया की जांच जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि प्रश्नपत्र तैयार करने, सुरक्षित रखने, भेजने और परीक्षा केंद्र तक पहुंचाने में किस स्तर पर चूक हुई।
“सिर्फ परीक्षा स्थगित कर देने से मामला खत्म नहीं होगा। असली सवाल यह है कि ऐसी स्थिति पैदा क्यों हुई और इसे दोबारा रोकने के लिए क्या बदला गया। बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं, जवाबदेही चाहिए। विभाग को अब केवल सफाई नहीं, स्पष्ट व्यवस्था और ठोस कार्रवाई दिखानी चाहिए।”
उन्होंने मांग की कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, प्रश्नपत्र वितरण की वर्तमान व्यवस्था की समीक्षा हो और यदि किसी स्तर पर लापरवाही प्रमाणित होती है तो जिम्मेदारी तय की जाए।
फिलहाल मामला केवल कथित वायरल प्रश्नपत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। प्रश्नपत्र की गोपनीयता, पीडीएफ-व्हाट्सऐप के जरिए वितरण की प्रक्रिया, परीक्षा शुरू होने के समय और प्रश्नपत्र उपलब्ध होने के समय के बीच का अंतर, अलग-अलग कक्षाओं के लिए अपनाए गए मापदंड तथा मूल्यांकन व्यवस्था को लेकर विभाग की आधिकारिक स्थिति—इन सभी बिंदुओं पर सवाल उठ रहे हैं।
इन आरोपों और दावों पर शिक्षा विभाग का आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।
