जर्जर आंगनबाड़ी में जान जोखिम में डालकर बैठने को मजबूर मासूम, छत से झड़ रहा प्लास्टर… बाहर निकल आया लेंटर का सरिया, जिम्मेदारों की चुप्पी ने खड़े किए गंभीर सवाल

छुरा विकासखंड के ग्राम पंचायत पेंड्रा की आंगनबाड़ी बनी हादसे का इंतजार करती इमारत, बच्चों की सुरक्षा को लेकर महिला एवं बाल विकास विभाग और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल।

छुरा। एक ओर सरकार “सुपोषित बचपन” और “सुरक्षित आंगनबाड़ी” के दावे कर करोड़ों रुपये खर्च करने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर छुरा विकासखंड के ग्राम पंचायत पेंड्रा की तस्वीर इन दावों की सच्चाई उजागर कर रही है। यहां आंगनबाड़ी भवन इस कदर जर्जर हो चुका है कि छत का प्लास्टर लगातार टूटकर गिर रहा है, लेंटर का सरिया पूरी तरह बाहर दिखाई देने लगा है और दीवारों का कंक्रीट उखड़कर पत्थर तक नजर आने लगे हैं। भवन अब बच्चों के लिए शिक्षा का केंद्र कम और किसी बड़े हादसे का इंतजार करता खंडहर ज्यादा दिखाई देता है।

हालात इतने भयावह हैं कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने बच्चों की जान को खतरे में देख उन्हें भवन के भीतर बैठाना बंद कर दिया है। मजबूरी में बच्चों की पढ़ाई और गतिविधियां आंगनबाड़ी के सामने स्थित स्वास्थ्य केंद्र के टिनशेड के नीचे संचालित की जा रही हैं। यह दृश्य अपने आप में बताने के लिए काफी है कि सरकारी व्यवस्था बच्चों को सुरक्षित छत तक उपलब्ध कराने में विफल साबित हुई है।

सरिया बाहर, प्लास्टर नीचे… हादसे की खुली चेतावनी

भवन के कई हिस्सों से प्लास्टर पूरी तरह झड़ चुका है। लेंटर का सरिया खुला दिखाई दे रहा है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि भवन की मजबूती गंभीर रूप से प्रभावित हो चुकी है। बरसात के मौसम में यह खतरा और भी बढ़ गया है। यदि समय रहते इस भवन को खाली कर नया भवन उपलब्ध नहीं कराया गया तो कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।

क्या मॉनिटरिंग केवल कागजों में हो रही है?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या स्थानीय जनप्रतिनिधि, महिला एवं बाल विकास विभाग के परियोजना अधिकारी, पर्यवेक्षक (सुपरवाइजर) और संबंधित अधिकारी कभी इस आंगनबाड़ी केंद्र का निरीक्षण करने पहुंचे हैं?
यदि निरीक्षण हुआ है तो इतनी जर्जर स्थिति के बावजूद अब तक मरम्मत या नए भवन का प्रस्ताव क्यों नहीं भेजा गया?

और यदि निरीक्षण नहीं हुआ, तो यह सीधे-सीधे विभागीय लापरवाही का मामला है।

ग्रामीणों का कहना है कि भवन की बदहाल स्थिति कोई एक-दो दिन पुरानी नहीं है। लंबे समय से भवन जर्जर है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने केवल कागजी कार्रवाई तक खुद को सीमित रखा। सवाल उठता है कि क्या मॉनिटरिंग रिपोर्ट सिर्फ कार्यालयों में बैठकर तैयार की जा रही है?

जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में

ग्राम पंचायत के जनप्रतिनिधियों से लेकर क्षेत्र के अन्य जनप्रतिनिधि भी इस गंभीर समस्या पर अब तक प्रभावी पहल करते नजर नहीं आए। जब मासूम बच्चों की जान खतरे में है, तब उनकी चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

क्या जनप्रतिनिधियों को इस जर्जर भवन की जानकारी नहीं है?

या फिर जानकारी होने के बावजूद इसे नजरअंदाज किया जा रहा है?

क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन और जनप्रतिनिधि सक्रिय होंगे?

कार्यकर्ता ने निभाई जिम्मेदारी, सिस्टम हुआ बेनकाब

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए बच्चों को जर्जर भवन से बाहर निकालकर सुरक्षित स्थान पर बैठाना शुरू कर दिया। यदि कार्यकर्ता ऐसा नहीं करतीं तो किसी भी दिन प्लास्टर या कंक्रीट का बड़ा हिस्सा बच्चों के ऊपर गिर सकता था। इससे साफ है कि जमीनी स्तर पर कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग और प्रशासन की कार्यप्रणाली गंभीर सवालों के घेरे में है।

करोड़ों के दावे, लेकिन मासूमों को सुरक्षित छत नहीं

हर साल आंगनबाड़ी भवनों के निर्माण, मरम्मत और बच्चों के विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन पेंड्रा की यह तस्वीर बताती है कि योजनाएं आखिर जमीन पर कितनी प्रभावी हैं। यदि एक आंगनबाड़ी भवन की ऐसी स्थिति है, तो अन्य भवनों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

ग्रामीणों में आक्रोश

ग्रामीणों ने तत्काल नए आंगनबाड़ी भवन के निर्माण, जर्जर भवन को अनुपयोगी घोषित करने तथा पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा से बड़ा कोई विषय नहीं हो सकता।

जनता के तीखे सवाल…

क्या महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी केवल कागजों में निरीक्षण कर रहे हैं?

क्या स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने कभी इस आंगनबाड़ी भवन की वास्तविक स्थिति देखने की जरूरत नहीं समझी?

क्या जिम्मेदार अधिकारी जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं?

क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?

यदि किसी मासूम की जान चली गई तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

क्या तब भी केवल जांच समिति बनाकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

प्रशासन से मांग

जर्जर आंगनबाड़ी भवन को तत्काल असुरक्षित घोषित किया जाए।

बच्चों के लिए स्थायी रूप से सुरक्षित वैकल्पिक भवन उपलब्ध कराया जाए।

नए आंगनबाड़ी भवन का तत्काल निर्माण स्वीकृत कर युद्धस्तर पर कार्य शुरू किया जाए।

महिला एवं बाल विकास विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों एवं मॉनिटरिंग में लापरवाही बरतने वालों की जवाबदेही तय कर कार्रवाई की जाए।

“जब तक व्यवस्था नहीं जागेगी, तब तक मासूम बच्चों का भविष्य और उनकी सुरक्षा दोनों खतरे में रहेंगे। सवाल सिर्फ एक भवन का नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता और जवाबदेही का है।”

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