पुल नहीं मिला तो मौत से समझौता कर रहे जरंडी के लोग! भूख मिटाने राशन लेने हो या बच्चों को पढ़ाने स्कूल भेजना—हर रास्ता जाता है मौत की तेज धार के बीच से, नदी पर पुल नहीं होने से ग्रामीणों की जिंदगी बनी जोखिम

“साहब! पेट की आग और बच्चों के भविष्य के लिए आखिर कब तक नदी में उतरें?”
संवाददाता :- अनीश सोलंकी
मैनपुर। गरियाबंद जिले के ग्राम जरंडी की तस्वीरें व्यवस्था और विकास के तमाम दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। गांव और जंगल धवलपुर के बीच बहने वाली बड़ी नदी पर पुल नहीं होने के कारण यहां के ग्रामीणों को आज भी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर बच्चों की शिक्षा तक के लिए जान हथेली पर रखकर नदी पार करनी पड़ रही है।
यहां नदी महज पानी की धारा नहीं रह गई है, बल्कि ग्रामीणों की जिंदगी की सबसे बड़ी मजबूरी और सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। पेट की भूख शांत करने के लिए सरकारी राशन चाहिए तो नदी पार करो, घर का सामान खरीदना है तो नदी पार करो, जरूरी काम से जंगल धवलपुर जाना है तो नदी पार करो और बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए भेजना है तो भी इसी नदी के तेज बहाव का सामना करना पड़ता है।
एक तरफ पेट की भूख, दूसरी तरफ मौत का डर
जरंडी के ग्रामीणों के सामने बरसात के दिनों में सबसे बड़ा संकट खड़ा हो जाता है। नदी में पानी बढ़ते ही आवागमन खतरनाक हो जाता है। तेज बहाव के बावजूद जरूरतमंद ग्रामीण सामान लेकर नदी पार करते दिखाई देते हैं।
सामने आई तस्वीरें इस दर्दनाक हकीकत को साफ बयां कर रही हैं।
ग्रामीण कमर से लेकर सीने तक पानी के बीच एक-दूसरे का सहारा लेते हुए नदी पार कर रहे हैं। किसी के हाथ में सामान है तो कोई परिवार के सदस्य को संभाल रहा है। यह दृश्य किसी रोमांच का नहीं, बल्कि वर्षों से सुविधाओं के अभाव में जी रहे ग्रामीणों की मजबूरी का है।
किताबों की जगह बच्चों को थामना पड़ रहा है नदी का हाथ!
सबसे गंभीर स्थिति स्कूली बच्चों को लेकर है। जरंडी के बच्चों को शिक्षा के लिए भी नदी पार करनी पड़ती है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताब, कॉपी और स्कूल बैग होना चाहिए, उस उम्र में उन्हें तेज धार वाली नदी पार करने के खतरे से गुजरना पड़ रहा है।
बरसात के दिनों में अभिभावकों की चिंता और बढ़ जाती है। नदी का बहाव तेज होने पर बच्चों को स्कूल भेजना जोखिम भरा हो जाता है। ऐसे में कई बार शिक्षा और सुरक्षा के बीच परिवारों को मजबूरी में चुनाव करना पड़ता है।
सवाल यह है कि जिस देश और प्रदेश में बच्चों की शिक्षा को उनका अधिकार माना जाता है, वहां जरंडी के बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के लिए नदी से जिंदगी की बाजी क्यों लगानी पड़ रही है?
राशन भी नदी के उस पार, बाजार भी नदी के उस पार
जरंडी गांव की भौगोलिक स्थिति ग्रामीणों की परेशानी को और बढ़ा देती है। सरकारी राशन, रोजमर्रा की जरूरत का सामान और अन्य आवश्यक सेवाओं के लिए ग्रामीणों को जंगल धवलपुर की ओर जाना पड़ता है।
पुल नहीं होने के कारण नदी पार करना ही मुख्य रास्ता है। बारिश के दिनों में यही रास्ता जानलेवा परीक्षा बन जाता है।
किसी परिवार में राशन खत्म हो जाए तो नदी पार करना मजबूरी है। घर में जरूरी सामान चाहिए तो नदी पार करना मजबूरी है। बच्चों की पढ़ाई के लिए जाना हो तो नदी पार करना मजबूरी है। यानी जरंडी के ग्रामीणों की जिंदगी में “जरूरत” का दूसरा नाम ही नदी पार करना बन गया है।
इलाज की जरूरत पड़ी तो क्या होगा?
ग्रामीणों की चिंता केवल राशन और शिक्षा तक सीमित नहीं है। अचानक किसी की तबीयत बिगड़ जाए, गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो या किसी मरीज को तत्काल उपचार की जरूरत पड़ जाए, तो तेज बहाव वाली नदी बड़ी बाधा बन सकती है।
ग्रामीणों का कहना है कि बरसात में नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद हालात और गंभीर हो जाते हैं। ऐसे समय में गांव का संपर्क प्रभावित होना किसी भी आपात स्थिति को बड़ा संकट बना सकता है।
विकास के दावों के बीच जरंडी की दर्दनाक तस्वीर
एक तरफ गांवों में विकास और सुविधाओं की पहुंच की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर जरंडी की यह तस्वीर जमीनी हकीकत सामने रख रही है।
जहां एक पुल ग्रामीणों की जिंदगी बदल सकता है, वहां पुल के अभाव में ग्रामीणों को अपनी जिंदगी दांव पर लगानी पड़ रही है।
जरंडी के ग्रामीणों का कहना है कि नदी पर पुल बनने से न केवल आवागमन आसान होगा, बल्कि बच्चों की शिक्षा, राशन की उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजमर्रा के कामों में भी बड़ी राहत मिलेगी।
“किसी हादसे के बाद जागेगा प्रशासन या पहले बनेगा पुल?”
ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि आखिर प्रशासन कब इस समस्या को गंभीरता से लेगा। क्या किसी बच्चे या ग्रामीण के नदी में बहने जैसी बड़ी अनहोनी का इंतजार किया जा रहा है? या उससे पहले ही प्रशासन इस समस्या का स्थायी समाधान करेगा?
जरंडी के ग्रामीणों को अब सिर्फ आश्वासन नहीं चाहिए। उन्हें ऐसा रास्ता चाहिए जिस पर चलते समय मौत का डर न हो।
नदी पर पुल निर्माण की मांग लंबे समय से ग्रामीणों के लिए जीवन की सबसे बड़ी जरूरत बनी हुई है। ग्रामीण चाहते हैं कि संबंधित विभाग और प्रशासन मौके का निरीक्षण कर पुल निर्माण की ठोस पहल करें, ताकि आने वाली पीढ़ी को भी इसी तरह जान जोखिम में डालकर शिक्षा और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए नदी पार न करनी पड़े।
जरंडी की तस्वीर पूछ रही है बड़ा सवाल
क्या विकास का रास्ता जरंडी तक पहुंचते-पहुंचते नदी में डूब गया है?
क्या बच्चों की शिक्षा से ज्यादा मजबूत नदी की धार है?
क्या सरकारी राशन लेने के लिए भी ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालना ही पड़ेगा?
और सबसे बड़ा सवाल—आखिर कब बनेगा जरंडी की जिंदगी का इंतजार खत्म करने वाला पुल?
जरंडी की यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की परेशानी नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं से जूझते ग्रामीण भारत की उस सच्चाई की तस्वीर है, जहां पेट की भूख मिटाने और बच्चों का भविष्य बनाने के लिए भी लोगों को हर दिन मौत की तेज धार से होकर गुजरना पड़ रहा है।
