करोड़ों खर्च हुए… लेकिन मजबूती कहां गई? पांच साल में बने पुल की पहली बारिश में ही ध्वस्त हुई एप्रोच रोड

छुरा। छुरा विकासखंड के मड़ेली–जरगांव मार्ग पर घुनघुटी नाला पर लगभग 3 करोड़ 91 लाख 75 हजार रुपये की लागत से निर्मित उच्चस्तरीय पुल पहली ही बारिश की मार नहीं झेल सका। जिस पुल को महज 10 महीने में बनकर तैयार हो जाना था, वह विभागीय सुस्ती, ठेकेदार की लापरवाही और लगातार होती देरी के कारण करीब पांच वर्षों बाद वर्ष 2026 में बनकर तैयार हुआ। लेकिन निर्माण पूरा होने की खुशी अभी लोगों के चेहरे से उतरी भी नहीं थी कि सिर्फ तीन महीने के भीतर ही पुल की एप्रोच रोड कट गई और भारी वाहनों की आवाजाही पर रोक लग गई।
करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद पहली ही तेज बारिश में एप्रोच रोड का बह जाना अब पूरे निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि निर्माण मानकों के अनुरूप हुआ होता तो पहली ही बारिश में सड़क इस तरह नहीं टूटती। अब क्षेत्र की जनता पूछ रही है कि जब पुल तक तो बन गया, लेकिन उस तक पहुंचने वाली सड़क ही सुरक्षित नहीं रही, तो करोड़ों रुपये आखिर खर्च किस बात पर हुए?
देर से बना, अब टिकाऊपन पर उठे सवाल
सूचना फलक के अनुसार पुल निर्माण कार्य को 07 जून 2021 को प्रशासनिक स्वीकृति मिली थी। लगभग 391.75 लाख रुपये की लागत वाले इस कार्य को 24 दिसंबर 2022 तक पूरा किया जाना था। लेकिन निर्धारित समयसीमा बीतती गई और निर्माण कार्य वर्षों तक अधूरा पड़ा रहा। आखिरकार वर्ष 2026 में पुल तैयार हुआ, लेकिन उसका टिकाऊपन महज पहली बारिश में ही सवालों के घेरे में आ गया।
पहली बारिश में खुल गई गुणवत्ता की पोल
मानसून की पहली तेज बारिश ने एप्रोच रोड की कमजोर परतों को उधेड़ कर रख दिया। पुल के दोनों ओर सड़क में लंबी-लंबी दरारें पड़ गईं, डामर की परत उखड़ गई और सड़क का बड़ा हिस्सा बह गया। पुल के प्रवेश मार्ग पर गहरी कटान होने से बड़े वाहनों का आवागमन पूरी तरह बंद हो गया है। यदि समय रहते मरम्मत नहीं की गई तो छोटे वाहनों के लिए भी खतरा बढ़ सकता है।
जनता की खुशी कुछ ही दिनों में मातम में बदली
इस पुल के निर्माण का इंतजार क्षेत्र के लोग वर्षों से कर रहे थे। पुल बनने के बाद ग्रामीणों को उम्मीद थी कि अब बरसात में आवागमन की समस्या खत्म हो जाएगी और मड़ेली, जरगांव सहित आसपास के गांवों को बेहतर सड़क सुविधा मिलेगी। लेकिन पहली ही बारिश ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। अब लोग फिर से वही पुरानी परेशानी झेलने को मजबूर हैं।
भारी वाहनों की आवाजाही बंद,
ग्रामीणों को लंबा चक्कर
एप्रोच रोड क्षतिग्रस्त होने के कारण बसों, ट्रकों और अन्य भारी वाहनों का आवागमन बंद हो गया है। व्यापार, कृषि उपज के परिवहन और रोजमर्रा की आवाजाही प्रभावित हो रही है। लोगों को कई किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है, जिससे समय और ईंधन दोनों की बर्बादी हो रही है।
क्या निर्माण एजेंसी पर होगी कार्रवाई?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये की लागत से बने इस पुल की गुणवत्ता की निगरानी किसने की? यदि निर्माण तकनीकी मानकों के अनुरूप हुआ था तो पहली ही बारिश में एप्रोच रोड कैसे बह गई? क्या निर्माण एजेंसी, ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या मामला केवल मरम्मत तक सीमित रह जाएगा?
ग्रामीणों की मांग
ग्रामीणों ने मांग की है कि—
एप्रोच रोड का तत्काल स्थायी और तकनीकी मानकों के अनुरूप पुनर्निर्माण कराया जाए।
पूरे निर्माण कार्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए।
गुणवत्ता में लापरवाही पाए जाने पर ठेकेदार और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए जल निकासी और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
जनता के सवाल
▶ पांच साल तक निर्माण लटकने के बाद भी गुणवत्ता इतनी कमजोर क्यों?
▶ करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद पहली ही बारिश में सड़क क्यों बह गई?
▶ क्या जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार की जवाबदेही तय होगी?
▶ क्या जनता को फिर मरम्मत के नाम पर इंतजार और परेशानी झेलनी पड़ेगी?
घुनघुटी नाला का यह पुल अब केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है।
