चार महीने पहले लाखों खर्च कर लोक निर्माण विभाग ने कराई थी मरम्मत, बारिश आते ही उखड़ा डामर और बह गई गिट्टी — अब सड़क पर गड्ढे या गड्ढों में सड़क?

छुरा में लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल, घटिया मरम्मत का खामियाजा भुगत रही जनता
संवाददाता :- अनीश सोलंकी
छुरा। सड़क की बदहाली से परेशान जनता की आवाज जब पिछले वर्ष लगातार उठी, तब लोक निर्माण विभाग, गरियाबंद ने सड़कों की मरम्मत कराकर लोगों को राहत देने का दावा किया था। लाखों रुपये खर्च हुए, सड़क पर डामर और गिट्टी बिछाई गई और उम्मीद जगी कि अब आवागमन आसान होगा। लेकिन विभाग की यह उम्मीद और मरम्मत की मजबूती महज चार महीने में ही बारिश के पानी में बहती नजर आ रही है।
आज छुरा क्षेत्र की सड़कों की तस्वीरें विभाग के उन दावों पर सवाल खड़े कर रही हैं, जिनमें सड़क मरम्मत के बाद गुणवत्ता और मजबूती की बात कही गई थी। जगह-जगह सड़क की ऊपरी परत उखड़ चुकी है। गिट्टियां बाहर निकल आई हैं। बड़े-बड़े गड्ढों में बारिश का पानी जमा है। कई स्थानों पर सड़क का हिस्सा पूरी तरह क्षतिग्रस्त नजर आ रहा है।
सवाल यह है कि आखिर चार महीने में ही लाखों रुपये की मरम्मत का दम कैसे निकल गया?
मरम्मत हुई थी या सिर्फ गड्ढों पर खानापूर्ति?
स्थानीय लोगों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस सड़क पर सरकारी राशि खर्च कर मरम्मत कराई गई, उसकी हालत इतनी जल्दी खराब कैसे हो गई?
यदि सड़क की मरम्मत निर्धारित तकनीकी मापदंडों के अनुसार हुई थी और गुणवत्तापूर्ण सामग्री का इस्तेमाल किया गया था, तो कुछ ही महीनों में डामर की परत उखड़ने और गिट्टी बह जाने का कारण क्या है?
क्या सड़क मरम्मत से पहले तकनीकी जांच की गई थी?
क्या मरम्मत के दौरान सामग्री की गुणवत्ता की निगरानी हुई?
क्या विभागीय अधिकारियों ने मौके पर कार्य की गुणवत्ता जांची?
क्या कार्य पूर्ण होने के बाद उसका निरीक्षण किया गया?
और सबसे अहम—अगर काम सही था तो चार महीने में सड़क फिर से बदहाल क्यों हो गई?
इन सवालों का जवाब अब विभाग को जनता के सामने देना चाहिए।
बारिश ने खोल दी गुणवत्ता की पूरी पोल
बारिश शुरू होते ही सड़क की वास्तविक स्थिति सामने आ गई है। सड़क पर बने गड्ढों में पानी भर जाने के कारण वाहन चालकों को यह पता ही नहीं चलता कि कहां सड़क मजबूत है और कहां गड्ढा कितना गहरा है।
दोपहिया वाहन चालक सबसे ज्यादा परेशान हैं। गड्ढों से बचने के दौरान कई बार वाहन अनियंत्रित होने की स्थिति बनती है। सड़क पर लगातार पानी और कीचड़ जमा रहने से दुर्घटना का खतरा और बढ़ गया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क की मरम्मत जनता की सुविधा के लिए हुई थी, लेकिन घटिया काम ने जनता की परेशानी कम करने के बजाय फिर बढ़ा दी।
सड़क पर गड्ढे नहीं, हादसों का जाल
छुरा क्षेत्र की सड़कों पर जगह-जगह बने बड़े गड्ढे अब राहगीरों के लिए खतरा बन चुके हैं। बारिश के बाद गड्ढों में पानी भरने से सड़क की हालत और ज्यादा खतरनाक हो जाती है।
कई जगह वाहन चालक गड्ढों से बचने के लिए सड़क के दूसरे हिस्से में जाने को मजबूर होते हैं। इसी दौरान सामने से आने वाले वाहनों से टक्कर का खतरा बना रहता है।
साइकिल सवार, मोटरसाइकिल चालक और पैदल राहगीरों के लिए स्थिति और भी गंभीर है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की खराब स्थिति के कारण आए दिन लोग गिरकर चोटिल हो रहे हैं। वाहनों के टायर, रिम और अन्य हिस्सों को भी नुकसान पहुंच रहा है।
सरकारी राशि खर्च, फिर वही पुरानी कहानी
पिछले वर्ष सड़क की खराब हालत को लेकर लगातार समाचार प्रकाशित होने के बाद विभाग ने मरम्मत कार्य कराया था। जनता ने माना कि विभाग ने समस्या को गंभीरता से लिया है। लेकिन अब चार महीने के भीतर सड़क की जो तस्वीर सामने आई है, उसने पूरे मरम्मत कार्य पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक तरफ सरकारी राशि खर्च हुई, दूसरी तरफ सड़क फिर गड्ढों में तब्दील हो गई।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हर साल इसी तरह सड़क की मरम्मत के नाम पर राशि खर्च होती रहेगी और बारिश के बाद सड़क फिर उसी स्थिति में पहुंचती रहेगी?
जांच हुई तो सामने आ सकती है हकीकत
नगरवासियों और ग्रामीणों ने अब सड़क मरम्मत कार्य की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि केवल सड़क पर दोबारा गिट्टी डालकर समस्या का समाधान नहीं होगा। यह जांच जरूरी है कि पिछली मरम्मत में कितना बजट खर्च हुआ, किस एजेंसी या ठेकेदार ने काम किया, काम की लंबाई और लागत कितनी थी तथा क्या कार्य निर्धारित तकनीकी मापदंडों के अनुरूप किया गया था।
लोगों ने मांग की है कि संबंधित सड़क के मरम्मत कार्य की माप पुस्तिका, कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र, गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की भी जांच की जाए। यदि जांच में अनियमितता या गुणवत्ता में कमी सामने आती है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जानी चाहिए।
क्या जिम्मेदारी तय करेगा विभाग?
अब सबसे बड़ा सवाल लोक निर्माण विभाग के सामने है। सड़क की हालत सामने है, तस्वीरें सब कुछ बयां कर रही हैं। जनता पूछ रही है कि आखिर इतनी जल्दी सड़क क्यों उखड़ गई?
यदि सड़क निर्माण और मरम्मत की गुणवत्ता की जिम्मेदारी विभाग की निगरानी में थी, तो अब खराब सड़क के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
क्या विभाग सिर्फ फिर से मरम्मत कराकर मामले को खत्म करेगा, या पिछली मरम्मत की गुणवत्ता की जांच कर जिम्मेदारों की जवाबदेही भी तय करेगा?
जनता बोली—मरम्मत के नाम पर खानापूर्ति नहीं, चाहिए जवाब
ग्रामीणों और नगरवासियों का कहना है कि उन्हें बार-बार सड़क मरम्मत के नाम पर अस्थायी राहत नहीं चाहिए। जनता को ऐसी सड़क चाहिए जो बारिश और सामान्य यातायात का दबाव झेल सके।
लोगों का कहना है कि यदि सड़क मरम्मत में गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा गया तो सरकारी धन की बर्बादी के साथ-साथ आम जनता की जान भी खतरे में पड़ती है।
अब विभाग को सड़क की दोबारा मरम्मत से पहले यह बताना होगा कि पिछली मरम्मत चार महीने भी क्यों नहीं टिक पाई।
बड़ा सवाल : चार महीने में सड़क क्यों हुई फेल?
लाखों की राशि खर्च होने के बावजूद सड़क फिर बदहाल—जिम्मेदार कौन?
क्या मरम्मत कार्य की होगी तकनीकी जांच?
क्या संबंधित ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
क्या जनता को सरकारी राशि के खर्च का पूरा हिसाब मिलेगा?
छुरा की बदहाल सड़कें अब सिर्फ आवागमन की समस्या नहीं रह गई हैं, बल्कि सड़क मरम्मत की गुणवत्ता, सरकारी धन के उपयोग और विभागीय निगरानी की गंभीर परीक्षा बन गई हैं। जनता की नजर अब लोक निर्माण विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी है।
