वरिष्ठता के दम पर DEO प्रभार का दावा खारिज, हाईकोर्ट ने कहा—उच्च पद का प्रभार कोई कानूनी हक नहीं,गरियाबंद जिला शिक्षा अधिकारी के प्रभार को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला | कनिष्ठ अधिकारी को प्रभारी DEO बनाए जाने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज | उपयुक्तता, अनुभव और प्रशासनिक जरूरतों को भी माना महत्वपूर्ण

रिपोर्टर :- अनीश सोलंकी
गरियाबंद। गरियाबंद जिला शिक्षा अधिकारी के प्रभारी पद को लेकर चल रहे विवाद में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि केवल वरिष्ठता के आधार पर किसी कर्मचारी को उच्च पद का प्रभार पाने का स्वतः कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। अदालत ने कहा कि उच्च पद का प्रभार सौंपना सक्षम प्राधिकारी के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र का विषय है, जिसमें वरिष्ठता के साथ अधिकारी की उपयुक्तता, अनुभव, प्रशासनिक आवश्यकता और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जा सकता है।
मामला गरियाबंद जिला शिक्षा अधिकारी के प्रभारी पद से जुड़ा है। छुरा में ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत किशुन लाल मतावाले ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 10 जून 2026 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनसे कनिष्ठ अधिकारी राजेश चंद्राकर को गरियाबंद जिला शिक्षा अधिकारी का प्रभारी बनाया गया था।
वरिष्ठता और अनुभव का दिया हवाला
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि वे वर्ष 1995 से शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं तथा प्रधानाचार्य और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के रूप में लंबे समय का अनुभव रखते हैं। उनका दावा था कि संबंधित संवर्ग में वे राजेश चंद्राकर से वरिष्ठ हैं और निर्धारित सेवा अवधि पूरी करने के कारण जिला शिक्षा अधिकारी के पद का प्रभार संभालने के पात्र हैं।
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि उच्च पदों का प्रभार सौंपने संबंधी शासन के निर्देशों की अनदेखी करते हुए उनसे कनिष्ठ अधिकारी को DEO का प्रभार सौंप दिया गया। उन्होंने इस संबंध में सक्षम अधिकारियों के समक्ष अभ्यावेदन भी प्रस्तुत किया था और आदेश को निरस्त करने की मांग की थी।
सरकार ने किया याचिका का विरोध
राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ता मूल रूप से प्रधानाचार्य के पद पर पदस्थ हैं और छुरा में प्रभारी ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। सिर्फ वरिष्ठता के आधार पर उन्हें जिला शिक्षा अधिकारी का प्रभारी पद मांगने का अधिकार नहीं है।
सरकार की ओर से बताया गया कि राजेश चंद्राकर पात्र हैं तथा उन्हें प्रधानाचार्य पद पर पदोन्नति के बाद जिला शिक्षा अधिकारी गरियाबंद का वर्तमान प्रभार सौंपा गया है।
कलेक्टर की रिपोर्ट का भी आया उल्लेख
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से गरियाबंद कलेक्टर के 6 जून 2025 के पत्र का भी हवाला दिया गया। इसमें याचिकाकर्ता के खिलाफ शासकीय नियमों एवं निर्देशों के उल्लंघन तथा शासकीय दायित्वों के निर्वहन में कथित गंभीर लापरवाही से संबंधित टिप्पणियों का उल्लेख होने की बात कही गई। सरकार ने बताया कि उनके खिलाफ निलंबन एवं विभागीय जांच सहित अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रस्ताव भी भेजा गया था।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता केवल संवर्ग में वरिष्ठ होने के आधार पर जिला शिक्षा अधिकारी के वर्तमान प्रभार पर कोई कानूनी या प्रवर्तनीय अधिकार स्थापित नहीं कर सके।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई बाध्यकारी नियम अदालत के सामने नहीं लाया गया, जिसके तहत वरिष्ठ कर्मचारी को ही हर स्थिति में उच्च पद का वर्तमान प्रभार देना अनिवार्य हो।
कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठता अपने आप में उच्च पद का प्रभार पाने का पूर्ण अधिकार नहीं है। उच्च पद का प्रभार एक अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था है और सक्षम प्राधिकारी प्रशासनिक आवश्यकताओं को देखते हुए किसी उपयुक्त अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंप सकता है।
सिर्फ वरिष्ठता नहीं, उपयुक्तता भी जरूरी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि उच्च पद का प्रभार सौंपते समय केवल वरिष्ठता को ही निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। अधिकारी की समग्र उपयुक्तता, अनुभव, प्रशासनिक आवश्यकता तथा अन्य प्रासंगिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हैं।
अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि राजेश चंद्राकर को जिला शिक्षा अधिकारी का प्रभार सौंपने की प्रक्रिया किसी वैधानिक नियम अथवा बाध्यकारी शासन निर्देश का उल्लंघन करती है।
याचिका खारिज, 10 जून का आदेश बरकरार
हाईकोर्ट ने 10 जून 2026 को जारी उस आदेश में कोई ऐसी अवैधता, मनमानी या गंभीर त्रुटि नहीं पाई, जिसके आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप किया जा सके। इसके बाद अदालत ने किशुन लाल मतावाले की याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।
यह आदेश 11 अगस्त 2026 को पारित किया गया।
फैसले का संदेश साफ—वरिष्ठता हक नहीं, प्रशासनिक निर्णय सर्वोपरि
गरियाबंद DEO प्रभार विवाद में हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी विभागों में उच्च पदों के प्रभार को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि वरिष्ठता महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन वह अपने आप में उच्च पद का प्रभार पाने का कानूनी अधिकार नहीं बन जाती। सक्षम प्राधिकारी को अधिकारी की योग्यता, उपयुक्तता, अनुभव और प्रशासनिक परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेने का अधिकार है।
