तुगलकी फरमान का आतंक: ‘21 हजार दो, भोज दो… नहीं तो समाज से बाहर’,छुरा में बेटी की शादी की सजा भुगत रहा पूरा परिवार, 1 साल से न्याय के लिए भटकन—अब 50 हजार की नई डिमांड

रिपोर्टर :- अनीश सोलंकी
छुरा | गरियाबंद जिले के छुरा विकासखंड अंतर्गत ग्राम रानीपरतेवा से सामाजिक अन्याय और दबंगई का एक गंभीर मामला सामने आया है। यहां एक परिवार को केवल इसलिए समाज से बहिष्कृत कर दिया गया क्योंकि उनकी बेटी ने अपनी मर्जी से विवाह कर लिया।
पीड़ित महिला कामनी कौशल गोस्वामी ने आरोप लगाया है कि गांव के कथित समाज प्रमुखों और दबंगों ने सामाजिक बैठक बुलाकर उनके परिवार पर 21 हजार रुपये नगद और सामूहिक भोज का दंड थोप दिया। यह फरमान मानने से इनकार करने पर पूरे परिवार को समाज से बाहर कर दिया गया।
बेटी की पसंद बनी ‘अपराध’, परिवार पर टूटा सामाजिक कहर
जानकारी के अनुसार, महिला की 23 वर्षीय बेटी ने अपनी इच्छा से विवाह किया। इस फैसले के बाद गांव में बुलाई गई बैठक में परिवार को कठघरे में खड़ा कर दिया गया।
“समाज के नियम” का हवाला देते हुए उन्हें दंड स्वरूप 21 हजार रुपये और भोज देने का आदेश सुनाया गया।
परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण जब उन्होंने असमर्थता जताई, तो समाज के लोगों ने महिला, उसके बीमार पति, बुजुर्ग सास और देवर को सामाजिक रूप से अलग-थलग कर दिया।
बहिष्कार का दायरा बढ़ा, देवर भी बना निशाना
पीड़िता के अनुसार, जब उनके देवर ने समाज से दोबारा जुड़ने का प्रयास किया, तो दबंगों ने दंड राशि बढ़ाकर 50 हजार रुपये कर दी। इसके साथ ही उसे भी समाज से बहिष्कृत कर दिया गया।
इस फैसले के बाद परिवार पूरी तरह से सामाजिक रूप से कट चुका है और रोजमर्रा के जीवन में भी कठिनाइयों का सामना कर रहा है।
1 साल से दर-दर भटकन, लेकिन न्याय नहीं
पीड़ित महिला ने बताया कि वे पिछले एक वर्ष से न्याय के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। उन्होंने:
स्थानीय थाने में शिकायत दर्ज कराई
मानव अधिकार आयोग में गुहार लगाई महिला आयोग तक मामला पहुंचाया
लेकिन अब तक किसी भी स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
एसपी से गुहार,के बाद पुलिस ने बुला कर लिया बयान
मामले में पीड़िता द्वारा पुलिस अधीक्षक गरियाबंद से शिकायत किए जाने के बाद पुलिस ने परिवार को थाने बुलाकर बयान दर्ज किया है।
बीमार पति, बुजुर्ग सास… संकट में पूरा परिवार
पीड़िता ने बताया कि उनके पति लंबे समय से बीमार हैं और बुजुर्ग सास की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है। ऐसे में सामाजिक बहिष्कार ने उनके जीवन को और कठिन बना दिया है।
परिवार को गांव में सामाजिक सहयोग नहीं मिल रहा, जिससे वे मानसिक और आर्थिक दोनों तरह के दबाव में हैं।
“न्याय नहीं मिला तो उठाएंगे कठोर कदम”
पीड़िता ने प्रशासन से गुहार लगाते हुए कहा है कि उन्हें कानून पर पूरा भरोसा है, लेकिन यदि समय रहते न्याय नहीं मिला, तो वे मजबूरन कठोर कदम उठाने को विवश हो सकते हैं।
बड़े सवाल खड़े करता मामला
यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है—
क्या आज भी गांवों में कानून से ऊपर “समाज का फरमान” चलता है?
क्या अपनी पसंद से शादी करना अपराध है?
आखिर कब रुकेगा सामाजिक बहिष्कार और दबंगई का यह सिलसिला?
अब निगाहें प्रशासन पर—क्या मिलेगा पीड़ित परिवार को न्याय या चलता रहेगा तुगलकी फरमान?
