राखी के धागों से लिख रहीं आत्मनिर्भरता की नई इबारत, गायत्री स्व सहायता समूह की महिलाओं ने रचा सफलता का सुनहरा अध्याय’बिहान’ योजना से मिली नई उड़ान, मेहनत और हुनर के दम पर घर बैठे स्वरोजगार… इस बार दोगुने मुनाफे की उम्मीद

रिपोर्टर :- अनीश सोलंकी
गरियाबंद। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के तहत गरियाबंद जिले की ग्रामीण महिलाएं अब आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। जिला मुख्यालय से लगे ग्राम सढ़ौली की गायत्री स्व सहायता समूह की महिलाएं अपने हुनर और मेहनत से आकर्षक राखियां तैयार कर आर्थिक सशक्तिकरण की नई मिसाल पेश कर रही हैं। खेती-बाड़ी और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच समय निकालकर ये महिलाएं न केवल सुंदर और आकर्षक राखियां बना रही हैं, बल्कि स्वरोजगार के जरिए अपने परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत कर रही हैं।
11 सदस्यीय इस समूह की महिलाएं इस वर्ष अब तक 50 दर्जन से अधिक राखियों का निर्माण कर चुकी हैं और रक्षाबंधन को देखते हुए लगातार राखी बनाने में जुटी हुई हैं। प्रतिदिन लगभग एक घंटे की मेहनत से तैयार हो रही इन कलात्मक राखियों की बाजार में अच्छी मांग रहने की उम्मीद है।
समूह की अध्यक्ष श्रीमती भोजेश्वरी ध्रुव ने बताया कि पिछले वर्ष समूह ने 35 दर्जन राखियों का निर्माण किया था। लगभग 3,500 रुपये की लागत से तैयार राखियों की बिक्री से करीब 7,000 रुपये की आय हुई थी, जिससे लागत का लगभग दोगुना लाभ प्राप्त हुआ। इसी सफलता से उत्साहित होकर इस वर्ष समूह ने करीब 10 हजार रुपये की लागत से कच्चा माल खरीदा है और महिलाओं को भरोसा है कि इस बार पिछले वर्ष से भी अधिक मुनाफा मिलेगा।
समूह की महिलाओं का कहना है कि राखी निर्माण केवल अतिरिक्त आय का जरिया नहीं है, बल्कि इससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ा है, नए कौशल विकसित हुए हैं और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला है। अब वे परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ स्वरोजगार के माध्यम से अपनी अलग पहचान भी बना रही हैं।
इस सफलता के पीछे पीआरपी श्रीमती मीणा साहू के नेतृत्व, आरसेटी से प्राप्त प्रशिक्षण तथा जनपद पंचायत के बीपीएम श्री हेमंत तिर्की, क्षेत्रीय समन्वयक श्री प्रफुल्ल देवांगन एवं श्रीमती रचना देवांगन के निरंतर मार्गदर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्व सहायता समूहों की ऐसी पहलें यह साबित कर रही हैं कि यदि महिलाओं को सही प्रशिक्षण, अवसर और मार्गदर्शन मिले तो वे न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे समाज की आर्थिक तस्वीर बदल सकती हैं। गरियाबंद जिले की यह पहल महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का प्रेरणादायी उदाहरण बनकर उभर रही है।
