मौत की सीढ़ी चढ़कर स्कूल जाते हैं मासूम! 20 फीट ऊंचे पिलर पर हर रोज जिंदगी दांव पर, पैरी नदी के अधूरे पुल ने बच्चों को बनाया ‘जान जोखिम में डालने’ को मजबूर

5 साल से करोड़ों का पुल अधूरा, नीचे उफनती नदी और ऊपर खतरनाक लोहे की सीढ़ी… कलेक्टर की फटकार भी ठेकेदार को नहीं डरा सकी!
संवाददाता – अनीश सोलंकी
मैनपुर। यह तस्वीर किसी डरावनी फिल्म के दृश्य से कम नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां कोई फिल्म नहीं चल रही, बल्कि मासूम बच्चे हर रोज अपनी जिंदगी की बाजी लगाकर स्कूल जा रहे हैं। कंधे पर किताबों से भरा बस्ता, आंखों में पढ़-लिखकर आगे बढ़ने का सपना और सामने मौत का रास्ता।
तहसील मुख्यालय मैनपुर से महज 5 किलोमीटर दूर देहारगुड़ा और खामभाठा के बीच पैरी नदी पर अधूरा पड़ा पुल आज स्कूली बच्चों के लिए सुविधा का रास्ता नहीं, बल्कि खतरे का जाल बन चुका है।
पुल के अधूरे निर्माण के कारण बच्चों को करीब 20 फीट ऊंचे पिलर पर लगी लोहे की संकरी सीढ़ी के सहारे चढ़कर दूसरी ओर जाना पड़ता है। नीचे नदी का पानी और ऊपर असुरक्षित लोहे की सीढ़ी—एक छोटी सी चूक और सीधे मौत का खतरा!
एक हाथ में बस्ता, दूसरे हाथ से मौत की सीढ़ी का सहारा!
सुबह स्कूल जाने के दौरान जब बच्चे इस लोहे की सीढ़ी पर एक-एक कदम रखते हैं तो उनके नीचे गहराई होती है और ऊपर स्कूल पहुंचने की मजबूरी। भारी स्कूल बैग के साथ इस संकरी सीढ़ी पर चढ़ना किसी चुनौती से कम नहीं है।
बारिश में खतरा और भी बढ़ जाता है। सीढ़ियां भीगने के बाद फिसलन पैदा करती हैं। नदी में पानी बढ़ने पर हालात और भयावह हो जाते हैं। बावजूद इसके बच्चों के पास स्कूल पहुंचने के लिए कोई सुरक्षित विकल्प नहीं है।
परिजनों का कहना है कि बच्चों को स्कूल भेजते समय पढ़ाई की चिंता से ज्यादा यह डर सताता है कि बच्चा शाम को सुरक्षित वापस घर लौटेगा या नहीं।
‘पढ़ने’ निकले बच्चे कहीं ‘हादसे’ का शिकार न हो जाएं!
सरकार बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए तमाम योजनाएं चला रही है। स्कूल चलो अभियान से लेकर ‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’ तक बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन मैनपुर के देहारगुड़ा-खामभाठा क्षेत्र में जमीनी तस्वीर इन दावों को आईना दिखा रही है।
यहां बच्चे स्कूल जाने के लिए सुरक्षित सड़क नहीं, बल्कि 20 फीट ऊंचे पिलर और लोहे की सीढ़ी का सहारा लेने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि इस रास्ते की भयावह स्थिति देखकर कई बार बच्चों के अभिभावकों के दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं। सवाल उठता है कि अगर किसी दिन कोई बच्चा सीढ़ी से नीचे गिर गया तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
5 साल से निर्माणाधीन पुल… खत्म नहीं हो रहा इंतजार!
देहारगुड़ा और खामभाठा के बीच पैरी नदी पर करीब 300 मीटर लंबे पुल का निर्माण पिछले 5-6 वर्षों से चल रहा है। ग्रामीणों के अनुसार निर्माण कार्य बेहद धीमी गति से किया जा रहा है।
पुल निर्माण में देरी को लेकर ग्रामीणों ने कई बार शिकायत की। करीब एक वर्ष पहले क्षेत्रीय विधायक जनक ध्रुव और तत्कालीन गरियाबंद कलेक्टर भगवान सिंह उईके ने मौके का निरीक्षण किया था।
निरीक्षण के दौरान निर्माण एजेंसी, ठेकेदार और संबंधित अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए निर्माण कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए गए थे। निर्माण एजेंसी ने बारिश से पहले छह माह में काम पूरा करने का भरोसा भी दिया था।
लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि साल बीत गया, बारिश फिर लौट आई, बच्चे आज भी उसी खतरे से गुजर रहे हैं और पुल अब भी अधूरा है।
कलेक्टर की फटकार भी बेअसर, ठेकेदार की ‘कछुआ चाल’ जारी!
ग्रामीणों का आरोप है कि पुल निर्माण की गति इतनी धीमी है कि वर्षों बाद भी काम पूरा नहीं हो सका।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है—
क्या निर्माण एजेंसी को प्रशासन का डर नहीं?
क्या जिम्मेदार विभाग ने निर्माण कार्य की नियमित निगरानी बंद कर दी है?
क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही जिम्मेदारों की नींद खुलेगी?
अधूरे पुल पर निकले नुकीले सरिए, हर कदम पर हादसे का खतरा
समस्या सिर्फ सीढ़ी तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों के मुताबिक अधूरे पुल पर जगह-जगह लोहे के सरिए और नुकीले रॉड खुले हुए हैं। इनके कारण बच्चों और ग्रामीणों के चोटिल होने का खतरा लगातार बना हुआ है।
करीब 300 मीटर लंबे निर्माणाधीन पुल पर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने से यह स्थान कभी भी बड़ी दुर्घटना का केंद्र बन सकता है।
एक तरफ नदी का उफान, दूसरी तरफ खुले सरिए और बीच में मजबूर बच्चे—यह तस्वीर प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ कब तक?
ग्रामीणों का कहना है कि वे लंबे समय से पुल निर्माण पूरा कराने की मांग कर रहे हैं। शिकायतें हुईं, अधिकारियों ने निरीक्षण किया, फटकार लगी, आश्वासन मिले—लेकिन हालात जस के तस हैं।
अब ग्रामीण पूछ रहे हैं—
“क्या प्रशासन किसी बच्चे के गिरने और गंभीर रूप से घायल होने का इंतजार कर रहा है?”
“क्या करोड़ों के पुल को पूरा कराने के लिए पहले किसी मासूम की जिंदगी की कीमत चुकानी होगी?”
ग्रामीणों ने खोला मोर्चा, हाईवे जाम की चेतावनी
ग्राम पंचायत सरपंच महेश दीवान, जनपद सदस्य प्रताप सिंह मरकाम, पूर्व उपसरपंच पवन दीवान, लोकेश साण्डे, लीलाधर, रामप्रसाद, सोहन नागेश, बुधराम साण्डे, हितराम, देवन सिंह नेताम, पूर्व सरपंच डिकेश्वरी साण्डे सहित ग्रामीणों ने प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग की है।
ग्रामीणों ने कहा कि नदी पार के खामभाठा सहित आसपास के मोहल्लों से दर्जनों छात्र-छात्राएं रोज स्कूल आते-जाते हैं। बारिश के दौरान नदी उफान पर होने से स्थिति और खतरनाक हो जाती है।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पुल निर्माण तत्काल पूरा कराया जाए, तब तक बच्चों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक आवागमन की व्यवस्था की जाए और निर्माण स्थल पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं।
ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो छात्र-छात्राओं और ग्रामीणों के साथ नेशनल हाईवे 130 सी पर चक्काजाम कर उग्र आंदोलन किया जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल—हादसे का इंतजार क्यों?
एक ओर बच्चे हाथों में किताबें लेकर अपने भविष्य को संवारने के लिए स्कूल जा रहे हैं और दूसरी ओर व्यवस्था की लापरवाही उन्हें हर दिन मौत के मुहाने तक पहुंचा रही है।
20 फीट ऊंचा पिलर… लोहे की संकरी सीढ़ी… नीचे नदी… ऊपर बच्चों की मजबूरी… और पांच साल से अधूरा पुल।
यह सिर्फ एक निर्माणाधीन पुल की कहानी नहीं, बल्कि उन मासूमों की जिंदगी का सवाल है जिनके कंधों पर देश का भविष्य टिका है।
अब देखना होगा कि प्रशासन इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या हादसा होने से पहले बच्चों को सुरक्षित रास्ता मिलेगा, या फिर एक दिन यही ‘मौत की सीढ़ी’ किसी परिवार की खुशियां हमेशा के लिए छीन लेगी?
