छुरा–राजिम सड़क चौड़ीकरण में मुरम-रेत के अवैध उत्खनन का खेल! खनिज विभाग की चुप्पी पर सवाल.. दिन-रात चल रही खुदाई, चैन माउंटेन और हाइवा से निकाली जा रही मुरम; पंचायत की अनुमति की आड़ में नियमों को दरकिनार करने का आरोप, जिला प्रशासन कब लेगा सुध?
खनिज विभाग बेखबर या जानबूझकर कार्रवाई से परहेज? राजस्व विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में
संवाददाता – अनीश सोलंकी
छुरा :- छुरा–राजिम सड़क चौड़ीकरण का काम इन दिनों मुरम और रेत के कथित अवैध उत्खनन को लेकर सवालों के घेरे में है। सड़क निर्माण के लिए निर्माण सामग्री कहां से आ रही है, मुरम की खुदाई के लिए वैध अनुमति ली गई है या नहीं और निकाली जा रही खनिज सामग्री का नियमानुसार रॉयल्टी भुगतान हो रहा है या नहीं—इन तमाम सवालों के बीच खनिज विभाग की निगरानी और जिला प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि सड़क चौड़ीकरण के नाम पर मुरम की खुदाई दिन-रात जारी है और चैन माउंटेन मशीनों तथा हाइवा वाहनों के जरिए बड़ी मात्रा में मुरम निकाली जा रही है। यदि इन गतिविधियों के लिए आवश्यक अनुमति और वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा रहा है, तो यह सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाने का मामला बन सकता है।
पंचायत की अनुमति से खनिज उत्खनन की छूट कैसे?
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि ठेकेदार द्वारा ग्राम पंचायतों के सरपंचों से मुरम खुदाई की अनुमति लेकर उत्खनन कराया जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पंचायत स्तर से मिली अनुमति के आधार पर खनिज उत्खनन किया जा सकता है? खनिज नियमों के तहत जहां आवश्यक हो, वहां सक्षम विभाग से अनुमति, स्वीकृत क्षेत्र, निर्धारित मात्रा और रॉयल्टी सहित अन्य शर्तों का पालन जरूरी होता है। ऐसे में पंचायत की अनुमति की आड़ में यदि आवश्यक खनिज स्वीकृतियों के बिना खुदाई की जा रही है, तो इसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

दिन-रात खुदाई, फिर भी विभाग की नजर क्यों नहीं?
बताया जा रहा है कि मुरम निकालने के लिए मशीनें और हाइवा लगातार सक्रिय हैं। यदि बड़े पैमाने पर उत्खनन हो रहा है, तो इसकी जानकारी संबंधित विभागों तक पहुंची या नहीं, यह भी जांच का विषय है। सवाल यह है कि खनिज विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने अब तक उत्खनन स्थलों का निरीक्षण किया है या नहीं? यदि निरीक्षण हुआ है, तो क्या वैध अनुमति, रॉयल्टी, परिवहन दस्तावेज और निकाली गई मुरम की मात्रा का मिलान किया गया? और यदि जांच नहीं हुई, तो इसकी वजह क्या है?
इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है। केवल सड़क निर्माण का काम चलने से निर्माण सामग्री के स्रोत और उत्खनन की वैधानिकता की जांच की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती।
राजस्व विभाग की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
मुरम उत्खनन के मामले में राजस्व विभाग की भूमिका भी जांच के दायरे में होनी चाहिए। यदि संबंधित क्षेत्रों में लगातार खुदाई हो रही है, तो प्रशासनिक स्तर पर इसकी जानकारी और स्थल की वास्तविक स्थिति का सत्यापन क्यों नहीं किया गया? क्या संबंधित अधिकारियों ने मौके पर जाकर जांच की है? यदि अनियमितता की शिकायतें सामने आई हैं, तो अब तक क्या कार्रवाई की गई? इन सवालों पर विभागों की ओर से स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए।
सड़क चौड़ीकरण के नाम पर नियमों की अनदेखी तो नहीं?
सड़क चौड़ीकरण विकास से जुड़ा महत्वपूर्ण कार्य है, लेकिन विकास कार्यों की आड़ में नियमों की अनदेखी की छूट नहीं दी जा सकती। निर्माण में उपयोग हो रही मुरम और रेत का वैध स्रोत, आवश्यक स्वीकृतियां, रॉयल्टी भुगतान तथा परिवहन दस्तावेजों की जांच होना जरूरी है। यदि सामग्री वैध तरीके से प्राप्त की जा रही है, तो संबंधित दस्तावेज सामने रखकर स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। वहीं, यदि बिना आवश्यक अनुमति उत्खनन या परिवहन किया जा रहा है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
जिला प्रशासन करे स्थल निरीक्षण, तय हो जिम्मेदारी
अब जिला प्रशासन से अपेक्षा है कि वह मामले को गंभीरता से लेते हुए छुरा–राजिम सड़क चौड़ीकरण में उपयोग की जा रही मुरम और रेत के स्रोत की जांच कराए। संबंधित उत्खनन स्थलों का निरीक्षण, मशीनों और हाइवा की आवाजाही का सत्यापन, खनिज अनुमति तथा रॉयल्टी दस्तावेजों की जांच और पंचायत स्तर पर जारी की गई अनुमतियों की वैधानिकता की पड़ताल की जानी चाहिए।
जांच में यदि अनियमितता प्रमाणित होती है, तो संबंधित ठेकेदार, जिम्मेदार व्यक्तियों और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की भूमिका तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
*सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कथित तौर पर दिन-रात मुरम की खुदाई हो रही है, तो खनिज और राजस्व विभाग की निगरानी कहां है? क्या विभागों को इसकी जानकारी नहीं है, या अब तक कार्रवाई नहीं होने की कोई दूसरी वजह है? इन सवालों का जवाब जांच और आधिकारिक तथ्यों से ही सामने आएगा। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले में जांच कराता है या सड़क निर्माण के बीच उठ रहे ये सवाल यूं ही अनुत्तरित रह जाते हैं।*
