*आरोपों की राजनीति से नहीं, प्रमाणों से मजबूत होता लोकतंत्र : प्रीतम सिन्हा*मतदाता सूची पर सवाल है तो दस्तावेजों के साथ संवैधानिक प्रक्रिया के तहत रखें — केवल बयानबाजी से नहीं निकलेगा समाधान*

संवाददाता – अनीश सोलंकी 

गरियाबंद :- मुख्य निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने संबंधी कांग्रेस की टिप्पणी पर भाजपा जिला उपाध्यक्ष प्रीतम सिन्हा ने कहा कि चुनाव और मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़े विषय हैं। इन पर सवाल उठाने का अधिकार सभी राजनीतिक दलों और नागरिकों को है, लेकिन ऐसे गंभीर आरोपों के साथ ठोस तथ्य, दस्तावेज और प्रमाण सामने रखना भी उतना ही आवश्यक है।

प्रीतम सिन्हा ने कहा कि निर्वाचन आयोग भारत की संवैधानिक संस्था है, जिसे चुनावों के संचालन और संबंधित निर्वाचन प्रक्रिया की जिम्मेदारी दी गई है। इसलिए आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़ी किसी भी शिकायत का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अधिक प्रभावी ढंग से निर्धारित कानूनी एवं निर्वाचन प्रक्रिया के माध्यम से किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी राजनीतिक दल के पास मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने, स्थानांतरण या संशोधन से संबंधित ठोस आपत्तियां हैं तो उन्हें संबंधित निर्वाचन अधिकारी के समक्ष प्रमाण सहित प्रस्तुत किया जाना चाहिए। निर्वाचन आयोग की व्यवस्था में मतदाता सूची से संबंधित दावे और आपत्तियों के लिए निर्धारित प्रपत्र एवं प्रक्रिया उपलब्ध है।

“आरोप नहीं, प्रमाण सामने रखें”

प्रीतम सिन्हा ने कहा कि लोकतंत्र में किसी भी संवैधानिक संस्था से जवाब मांगना गलत नहीं है, लेकिन आरोप लगाने और आरोप प्रमाणित करने में अंतर होता है। यदि वास्तव में कोई अनियमितता हुई है तो संबंधित मामले का विवरण, मतदाता सूची की संबंधित प्रविष्टियां, दस्तावेज और अन्य प्रमाण सार्वजनिक किए जाने चाहिए, ताकि जनता भी वास्तविक स्थिति को समझ सके।

उन्होंने कहा कि केवल यह कहना कि चुनाव प्रक्रिया में अनियमितता हुई है, अपने आप में पर्याप्त नहीं है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कौन-सी प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ, किस स्तर पर हुआ और उसके समर्थन में क्या प्रमाण उपलब्ध हैं।

राजनीतिक बयानबाजी के बजाय कानूनी रास्ता अपनाएं

भाजपा जिला उपाध्यक्ष ने कहा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने अथवा सुधार की प्रक्रिया के लिए निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट व्यवस्था बनाई है। आयोग के अनुसार फार्म-6, फार्म-7 और फार्म-8 के माध्यम से क्रमशः नाम जोड़ने, नाम हटाने/आपत्ति तथा विवरण में सुधार जैसी प्रक्रियाएं की जा सकती है।

ऐसे में यदि किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल को किसी मतदाता की प्रविष्टि पर आपत्ति है तो उसे प्रमाण सहित संबंधित निर्वाचन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। कानून में उपलब्ध प्रक्रिया का इस्तेमाल करने के बजाय सीधे राजनीतिक आरोप लगाना समस्या का समाधान नहीं है।

जनता को भी भ्रमित करने से बचना चाहिए

प्रीतम सिन्हा ने कहा कि चुनाव से जुड़े मामलों में राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी केवल अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के प्रति नहीं, बल्कि पूरे मतदाता वर्ग के प्रति होती है। इसलिए ऐसे संवेदनशील विषयों पर कोई भी बयान देने से पहले तथ्यों की पुष्टि करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि मतदाता का विश्वास किसी भी चुनावी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी है। यदि कहीं वास्तविक गड़बड़ी है तो उसे सामने लाया जाना चाहिए और यदि शिकायत तथ्यहीन है तो उसे भी तथ्यों के आधार पर स्पष्ट किया जाना चाहिए।

“लोकतंत्र में सवाल भी जरूरी हैं और जवाबदेही भी”

प्रीतम सिन्हा ने कहा कि भाजपा लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवाल पूछने और जवाबदेही तय करने के अधिकार का सम्मान करती है। लेकिन सवालों का समाधान दस्तावेज, प्रमाण, पारदर्शिता और कानून के माध्यम से होना चाहिए।

उन्होंने कहा—

> “लोकतंत्र में सवाल उठाना अधिकार है, लेकिन गंभीर आरोपों को प्रमाणित करना भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है। मतदाता सूची या चुनाव प्रक्रिया में यदि कोई वास्तविक अनियमितता है तो उसके प्रमाण सामने रखे जाएं और कानून के अनुसार कार्रवाई की मांग की जाए। केवल राजनीतिक बयानबाजी से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता; तथ्य और प्रमाण ही जनता का विश्वास मजबूत करते हैं।”

 

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