कलेक्टर ने माना दोषी , संचालनालय ने मांगा जवाब , जांच भी हुई… फिर भी कार्रवाई नहीं!,गरियाबंद शिक्षा विभाग का ‘दबा दिया गया’ मामला फिर सुर्खियों में, आखिर किसके संरक्षण में बचते रहे BEO?

 

गरियाबंद। गरियाबंद जिले के शिक्षा विभाग का एक चर्चित मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। यह मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों के अनुसार तत्कालीन कलेक्टर ने स्वयं विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) छुरा के.एल. मतावले के खिलाफ गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख करते हुए कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई एवं विभागीय जांच की अनुशंसा की थी। इसके बाद लोक शिक्षण संचालनालय, छत्तीसगढ़ ने भी पूरे मामले को गंभीर मानते हुए जिला शिक्षा अधिकारी से तत्काल तथ्यात्मक प्रतिवेदन, संबंधित दस्तावेज और अभिमत मांगा। विभागीय जांच भी हुई, लेकिन महीनों बाद भी कार्रवाई का कोई अंतिम परिणाम सार्वजनिक नहीं हुआ।

अब सवाल उठ रहे हैं कि यदि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई तो आखिर इसके पीछे वजह क्या है?

कलेक्टर की रिपोर्ट में दर्ज थे गंभीर आरोप

सरकारी अभिलेखों के अनुसार तत्कालीन कलेक्टर ने अपने प्रतिवेदन में उल्लेख किया था कि युक्तियुक्तकरण (रैशनलाइजेशन) प्रक्रिया के दौरान बीईओ द्वारा शासन के दिशा-निर्देशों की अनदेखी की गई, शिक्षकों के समायोजन में नियमों का पालन नहीं किया गया, अतिरिक्त शिक्षकों की गणना में गंभीर त्रुटियां की गईं तथा जिला स्तरीय समिति के समक्ष वास्तविक तथ्यों के बजाय भ्रामक जानकारी प्रस्तुत की गई।
प्रतिवेदन में यह भी उल्लेख था कि कई विद्यालयों के संबंध में वास्तविक स्थिति से अलग जानकारी दी गई तथा शासन को बार-बार गलत प्रतिवेदन भेजे गए।

कलेक्टर ने इसे छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 में वर्णित ईमानदारी (Integrity) एवं कर्तव्यपरायणता (Devotion to Duty) के विपरीत मानते हुए संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई और विभागीय जांच की अनुशंसा की थी।

संचालनालय ने भी माना मामला गंभीर

कलेक्टर की अनुशंसा के बाद लोक शिक्षण संचालनालय ने जिला शिक्षा अधिकारी गरियाबंद को पत्र जारी कर पूरे मामले का विस्तृत तथ्यात्मक प्रतिवेदन, अभिमत तथा संबंधित दस्तावेज तत्काल उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। इससे स्पष्ट हो गया कि मामला केवल जिला स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शासन स्तर पर भी गंभीरता से लिया गया।

पूर्व डीईओ ने नहीं भेजा प्रतिवेदन, अब नए डीईओ ने भेजे सभी दस्तावेज

जानकारी के अनुसार संचालनालय द्वारा मांगे गए प्रतिवेदन और दस्तावेज तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यकाल में संचालनालय को नहीं भेजे गए। इसके कारण मामला लंबे समय तक लंबित रहा।

इसी बीच जब नवभारत ने वर्तमान जिला शिक्षा अधिकारी राजेश चंद्राकर से इस संबंध में पक्ष जानना चाहा, तब उन्होंने बताया कि उन्हें गरियाबंद में पदस्थ हुए लगभग एक माह ही हुआ है। जैसे ही यह मामला उनके संज्ञान में आया, उन्होंने सोमवार 27 जुलाई 2026 को समस्त दस्तावेज, विस्तृत प्रतिवेदन एवं अभिमत लोक शिक्षण संचालनालय को भेज दिया।

वर्तमान जिला शिक्षा अधिकारी ने क्या कहा?

जिला शिक्षा अधिकारी राजेश चंद्राकर ने बताया कि वर्ष 2025 में शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण के दौरान छात्र संख्या के आधार पर शिक्षकों का समायोजन किया जाना था। इसके लिए विकासखंड एवं जिला स्तर पर समितियों का गठन किया गया था, जिसकी जिला स्तरीय समिति के अध्यक्ष तत्कालीन कलेक्टर थे।

उन्होंने बताया कि उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार छुरा विकासखंड से बीईओ द्वारा भेजे गए प्रतिवेदन में वरिष्ठता (सीनियरिटी) संबंधी तथ्यों में कथित त्रुटियां पाई गईं। आरोप है कि कुछ मामलों में वरिष्ठ शिक्षकों को कनिष्ठ तथा कनिष्ठ शिक्षकों को वरिष्ठ दर्शाकर सूची भेजी गई, जिससे युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया के दौरान विवाद उत्पन्न हुआ और कई शिक्षकों ने अपनी वास्तविक वरिष्ठता को लेकर आवेदन एवं अभ्यावेदन प्रस्तुत किए।

उन्होंने यह भी बताया कि कुछ शिक्षकों को ऐसे विषय का शिक्षक दर्शाकर अतिशेष घोषित किया गया, जिस विषय के वे वास्तविक शिक्षक नहीं थे। बाद में संबंधित दस्तावेजों में सुधार किए जाने के तथ्य भी अभिलेखों में दर्ज हैं।
डीईओ ने कहा कि पूरे प्रकरण की नोटशीट काफी विस्तृत है और विभिन्न आरोपों से संबंधित दस्तावेज संलग्न हैं। सभी उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर संचालनालय को विस्तृत प्रतिवेदन भेज दिया गया है तथा अब आगे की कार्रवाई सक्षम स्तर पर की जाएगी।

जांच हुई… लेकिन कार्रवाई कहां गई?

सूत्रों के अनुसार मामले में विभागीय जांच भी कराई गई, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि जांच का अंतिम निष्कर्ष क्या रहा। यदि आरोप निराधार थे तो संबंधित अधिकारी को दी गई क्लीन चिट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? और यदि आरोप सही पाए गए तो अनुशासनात्मक कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई?

यही सवाल पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना रहे हैं।
क्या फाइलों में दब गया मामला?

कलेक्टर का प्रतिवेदन, संचालनालय का पत्र, विभागीय जांच और फिर लंबे समय तक सन्नाटा—इस घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या यह मामला फाइलों में दबा दिया गया?

क्या किसी प्रभावशाली संरक्षण के कारण कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी?

क्या विभागीय जांच केवल औपचारिकता बनकर रह गई?

इन सवालों का जवाब अब तक सामने नहीं आया है।

शिक्षा विभाग की साख पर उठ रहे सवाल

शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि यदि जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी की अनुशंसा और संचालनालय के निर्देशों के बावजूद कार्रवाई नहीं होती, तो विभागीय जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। इसका प्रभाव नियमों का पालन करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के मनोबल पर भी पड़ सकता है।

अब जवाब शासन को देना होगा

अब पूरे मामले में सबसे बड़े सवाल शासन और लोक शिक्षण
संचालनालय के सामने हैं—

कलेक्टर की अनुशंसा पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?

विभागीय जांच की अंतिम रिपोर्ट क्या कहती है?

यदि संबंधित अधिकारी दोषमुक्त हैं तो आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?

यदि आरोप सही पाए गए तो अनुशासनात्मक कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई?

आखिर इस पूरे मामले की जिम्मेदारी किसकी है?

जनहित का बड़ा सवाल

यह मामला केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी जवाबदेही, प्रशासनिक पारदर्शिता और शिक्षा व्यवस्था में जनता के विश्वास से जुड़ा हुआ है। अब जबकि संचालनालय को विस्तृत प्रतिवेदन और सभी दस्तावेज भेजे जा चुके हैं, सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन इस मामले में क्या निर्णय लेता है।

यदि उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों में दर्ज गंभीर आरोप सही हैं, तो कार्रवाई कब होगी? और यदि आरोप गलत हैं, तो संबंधित अधिकारी को सार्वजनिक रूप से दोषमुक्त घोषित क्यों नहीं किया गया?

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