दो साल से अधूरा भवन, जिम्मेदार मौन!..11.69 लाख की लागत वाला आंगनबाड़ी भवन बना लापरवाही की मिसाल, निजी घर में चल रहा बच्चों का केंद्र
हर मंगलवार टीएल बैठक में समीक्षा के दावे, फिर सेमरा के अधूरे निर्माण पर प्रशासन की नजर क्यों नहीं?

सूचना बोर्ड के अक्षर तक मिटे, लेकिन जिम्मेदारों की जवाबदेही अब भी गायब!

संवाददाता – अनीश सोलंकी
छुरा :-सरकारी निर्माण कार्यों को समय-सीमा में पूरा कराने और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर लगातार निर्देश जारी किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन निर्देशों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। छुरा विकासखंड के ग्राम पंचायत सेमरा में 11 लाख 69 हजार रुपये की लागत से निर्माणाधीन आंगनबाड़ी भवन पिछले दो साल से अधूरा पड़ा है। गांव के छोटे-छोटे बच्चों को आज तक अपना आंगनबाड़ी भवन नसीब नहीं हो सका है और केंद्र आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के निजी निवास पर संचालित हो रहा है। हैरानी की बात यह है कि भवन के सामने लगाया गया निर्माण संबंधी सूचना बोर्ड भी बदहाली की कहानी बयां कर रहा है। बोर्ड पर लिखे अक्षर तक पूरी तरह मिट चुके हैं, लेकिन भवन का निर्माण अब तक पूरा नहीं हो सका है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर लाखों रुपये की लागत से बनने वाला भवन दो साल में भी पूरा क्यों नहीं हुआ और इसकी जवाबदेही किसकी है?
शुरुआत में तेज रफ्तार, आधा निर्माण होते ही थम गया काम
जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत सेमरा में 11 लाख 69 हजार रुपये की लागत से आंगनबाड़ी भवन का निर्माण ग्राम पंचायत के सरपंच-सचिव के माध्यम से कराया जा रहा था। शुरुआत में निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ा, जिससे ग्रामीणों को उम्मीद थी कि जल्द ही बच्चों को अपना भवन मिल जाएगा। लेकिन निर्माण कार्य आधे तक पहुंचने के बाद काम अचानक रुक गया। इसके बाद महीनों गुजरते गए और देखते ही देखते दो साल बीत गए, लेकिन भवन आज भी अधूरा पड़ा है। निर्माण कार्य की यह स्थिति पंचायत स्तर पर कार्यों की निगरानी और समय-सीमा के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
निर्माण की लेटलतीफी ऐसी कि सूचना बोर्ड के अक्षर तक मिट गए!
आंगनबाड़ी भवन निर्माण में हुई लेटलतीफी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भवन के सामने निर्माण कार्य की जानकारी देने के लिए लगाया गया सूचना बोर्ड भी अब अपनी पहचान खो चुका है। बोर्ड पर लिखे अक्षर पूरी तरह मिट चुके हैं, लेकिन भवन का निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका है। बोर्ड की बदहाल स्थिति और अधूरा भवन निर्माण कार्य की निगरानी तथा जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं। जिस भवन का निर्माण समय पर पूरा होकर बच्चों के उपयोग में आ जाना चाहिए था, वह आज भी अधूरा पड़ा है। आखिर निर्माण कार्य की निगरानी किस स्तर पर हुई और जिम्मेदारों ने समय रहते काम पूरा कराने के लिए क्या कदम उठाए?
हर मंगलवार टीएल बैठक में समीक्षा, फिर दो साल से अधूरे भवन पर नजर क्यों नहीं?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासन की निगरानी व्यवस्था को लेकर भी उठ रहा है। जानकारी के अनुसार, प्रत्येक मंगलवार को गरियाबंद कलेक्टर कार्यालय में आयोजित टीएल (टाइम लिमिट) बैठक में जिले में चल रहे विभिन्न निर्माण कार्यों की समीक्षा की जाती है। इन बैठकों में निर्माण कार्यों को गुणवत्ता के साथ निर्धारित समय-सीमा में पूरा करने के निर्देश भी दिए जाते हैं। इसके बावजूद सेमरा का आंगनबाड़ी भवन दो साल से अधूरा पड़ा है।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब जिले में निर्माण कार्यों की नियमित समीक्षा होती है, तो सेमरा के इस अधूरे आंगनबाड़ी भवन का मामला टीएल बैठक में क्यों नहीं पहुंचा? क्या संबंधित विभाग ने निर्माण कार्य की वास्तविक स्थिति से उच्च अधिकारियों को अवगत कराया? क्या भवन के लगातार अधूरे रहने की जानकारी समीक्षा के दौरान सामने आई? यदि मामला अधिकारियों के संज्ञान में था, तो निर्माण कार्य पूरा कराने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए? और यदि जानकारी ही नहीं पहुंची, तो फिर निर्माण कार्यों की निगरानी व्यवस्था किस हद तक प्रभावी है?
हालांकि, इस प्रकरण को टीएल बैठक में उठाया गया था या नहीं, इसकी आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है। लेकिन दो साल से अधूरे पड़े भवन की स्थिति प्रशासनिक समीक्षा और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल जरूर खड़े करती है। अब जरूरत है कि जिला प्रशासन इस मामले की वास्तविक स्थिति की जांच करे और यह स्पष्ट करे कि आखिर निर्माण कार्य इतने लंबे समय तक अधूरा क्यों पड़ा रहा।
शिकायतें हुईं, निरीक्षण हुआ, आश्वासन मिला; फिर भी निर्माण कार्य ठप
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के अनुसार, भवन का निर्माण अधूरा होने की जानकारी कई बार उच्च अधिकारियों को दी गई, लेकिन इसके बावजूद निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका। वहीं, परियोजना अधिकारी छुरा चंदू साहू ने बताया कि करीब दो माह पहले उन्होंने अधूरे आंगनबाड़ी भवन का निरीक्षण किया था और सरपंच-सचिव से चर्चा की थी।
परियोजना अधिकारी के मुताबिक, चर्चा के दौरान सरपंच और सचिव ने निर्माण कार्य अधूरा रहने के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया। दोनों ने अधूरे निर्माण कार्य को पूरा करने के लिए दो से तीन माह का समय मांगा था। लेकिन दो माह बीत जाने के बाद भी निर्माण कार्य दोबारा शुरू नहीं हो सका है। इससे निरीक्षण के बाद दिए गए आश्वासन और निर्माण कार्य की वास्तविक प्रगति के बीच अंतर साफ नजर आता है।
नौनिहालों के हिस्से में परेशानी, निजी घर बना आंगनबाड़ी केंद्र
आंगनबाड़ी केंद्र छोटे बच्चों को पोषण, देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन सेमरा में भवन अधूरा होने के कारण बच्चों को आज भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के निजी निवास पर संचालित केंद्र में जाना पड़ रहा है। दो साल से निर्माण कार्य अधूरा रहने के कारण बच्चों और उनके अभिभावकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सवाल यह है कि आखिर गांव के नौनिहालों को अपना भवन मिलने के लिए और कितना इंतजार करना पड़ेगा?
11.69 लाख के भवन पर सवाल, अब जवाबदेही तय करने की जरूरत
सेमरा का यह मामला सरकारी निर्माण कार्यों की निगरानी, समय-सीमा और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब भवन निर्माण की जिम्मेदारी तय थी, तो काम बीच में क्यों रुक गया? निर्माण कार्य में बाधा आने पर समय रहते उसका निराकरण क्यों नहीं किया गया? निरीक्षण के बाद समय-सीमा तय होने के बावजूद काम दोबारा क्यों शुरू नहीं हुआ? और जिला स्तर पर नियमित समीक्षा के बीच यह मामला अब तक निर्णायक कार्रवाई तक क्यों नहीं पहुंचा?
अब जरूरत केवल आश्वासन देने की नहीं, बल्कि निर्माण कार्य की वास्तविक स्थिति की जांच कर जिम्मेदारी तय करने और भवन को जल्द पूरा कराने की है। जिला प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सरकारी राशि से बन रहा भवन जल्द बच्चों के उपयोग में आए और भविष्य में इस तरह निर्माण कार्य अधूरे छोड़ने की स्थिति पैदा न हो।
*बड़ा सवाल यही है—जब हर मंगलवार टीएल बैठक में निर्माण कार्यों की समीक्षा होती है, तो सेमरा का दो साल से अधूरा आंगनबाड़ी भवन आखिर किसकी नजर से छूट गया? क्या जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होगी, या गांव के नौनिहालों को यूं ही निजी घर में संचालित केंद्र के सहारे रहना पड़ेगा?*
