“नदी लुटती रही… सिस्टम सोता रहा! छुरा में कथित अवैध रेत खनन चरम पर, सैकड़ों ट्रैक्टरों से रोज हो रहा परिवहन, आखिर किसका है संरक्षण?”

सुबह 5 बजे से शुरू होता है अवैध खनन का ‘ऑपरेशन’, हरदी, बोड़राबांधा, रानीपरतेवा, मुड़ागांव, रक्सी सहित कई घाटों पर धड़ल्ले से उत्खनन; राजस्व को भारी चपत, पर्यावरण पर गहरा संकट
रिपोर्टर :- अनीश सोलंकी
छुरा। गरियाबंद जिले के छुरा अंचल में अवैध रेत खनन और परिवहन का कारोबार इस समय अपने चरम पर पहुंच चुका है। हालात ऐसे हैं कि सुबह पांच बजे से पहले ही सूखा नदी सहित कई नदी घाटों पर ट्रैक्टरों की कतारें लग जाती हैं और देखते ही देखते सैकड़ों ट्रैक्टर रेत भरकर नगर और ग्रामीण सड़कों पर दौड़ने लगते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर खुलेआम चल रहे इस कथित अवैध कारोबार पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
क्या रेत माफियाओं के सामने प्रशासन पूरी तरह बेबस हो चुका है, या फिर किसी के संरक्षण में यह पूरा खेल चल रहा है?
सूत्रों और स्थानीय लोगों के अनुसार सूखा नदी, एनीकट क्षेत्र, ग्राम पंचायत हरदी, बोड़राबांधा, रानीपरतेवा, मुड़ागांव, रक्सी सहित कई स्थानों पर प्रतिदिन बड़े पैमाने पर रेत का कथित अवैध उत्खनन किया जा रहा है। सुबह अंधेरा रहते ही ट्रैक्टर नदी में उतर जाते हैं और सूरज निकलने तक सैकड़ों ट्रॉली रेत विभिन्न क्षेत्रों में पहुंचाई जा चुकी होती है। यह सिलसिला रोजाना जारी रहने का दावा किया जा रहा है।
नदी का अस्तित्व खतरे में, पर्यावरण को गहरी चोट
अनियंत्रित रेत उत्खनन से सूखा नदी का प्राकृतिक स्वरूप लगातार बिगड़ता जा रहा है। नदी की गहराई बढ़ने, जलधारा प्रभावित होने, किनारों पर कटाव बढ़ने तथा भू-जल स्तर गिरने का खतरा बढ़ता जा रहा है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में इसका गंभीर असर कृषि, पेयजल और जैव विविधता पर भी पड़ सकता है।
सरकार को राजस्व का भारी नुकसान
जहां एक ओर शासन खनिज संपदा से राजस्व बढ़ाने की बात करता है, वहीं दूसरी ओर कथित अवैध रेत परिवहन से सरकारी खजाने को हर दिन लाखों रुपये के नुकसान की आशंका जताई जा रही है। बिना वैध रॉयल्टी और अनुमति के निकाली जा रही रेत से सरकार को मिलने वाला राजस्व सीधे प्रभावित हो रहा है।
धूल का गुबार बना जानलेवा
रेत से लदे ट्रैक्टर तेज रफ्तार से नगर और ग्रामीण मार्गों पर दौड़ रहे हैं। ट्रैक्टरों से उड़ने वाली रेत राहगीरों की आंखों में चली जाती है और लोगों को सांस लेने में भी परेशानी होती है। कई बार सड़क पर धूल का गुबार इतना अधिक हो जाता है कि सामने से आ रहे वाहन तक दिखाई नहीं देते, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बना रहता है।
क्या प्रशासन से भी तेज है रेत माफियाओं का नेटवर्क?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जैसे ही किसी विभाग के अधिकारियों के निकलने की भनक लगती है, रेत परिवहन कुछ समय के लिए बंद हो जाता है। कार्रवाई करने वाली टीम के लौटते ही फिर वही ट्रैक्टर नदी में उतर जाते हैं।
इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कार्रवाई की सूचना पहले किसके माध्यम से तस्करों तक पहुंच रही है?
जनता के सवाल, जवाब किसके पास?
जब हर सुबह सैकड़ों ट्रैक्टर सड़कों पर दौड़ रहे हैं तो जिम्मेदार विभागों को यह क्यों नहीं दिखाई देता?
आखिर किसके संरक्षण में यह कथित अवैध कारोबार फल-फूल रहा है?
राजस्व और पर्यावरण को हो रहे नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
क्या जिला प्रशासन और खनिज विभाग इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करेगा?
क्षेत्र के लोगों ने जिला प्रशासन, खनिज विभाग और पुलिस प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर अवैध रेत उत्खनन एवं परिवहन में शामिल लोगों पर सख्त कार्रवाई की जाए। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो सूखा नदी सहित क्षेत्र की अन्य नदियों का अस्तित्व भी गंभीर संकट में पड़ सकता है।
