छुरा ब्लॉक में विकास बह गया पानी में: पुलिया टूटी, सड़क बही, दर्जनों गांवों का मुख्यालय से टुटा संपर्क,ग्रामीणों का फूटा गुस्सा—”बारिश से नहीं, विभाग की लापरवाही से टूटा रास्ता”, हर साल दोहराई जाती है वही कहानी

छुरा। मानसून की पहली ही तेज बारिश ने छुरा ब्लॉक में लोकनिर्माण विभाग (PWD) के दावों की हकीकत उजागर कर दी। बीती रात हुई मूसलाधार बारिश के बाद कोसमबुड़ा–सारागांव–रसेला होते हुए ओडिशा सीमा को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण मार्ग पर स्थित पुलिया के आगे सड़क का बड़ा हिस्सा बह गया। इसके साथ ही दर्जनों गांवों का छुरा ब्लॉक मुख्यालय से संपर्क पूरी तरह टूट गया। लोगों का कहना है कि यह प्राकृतिक आपदा कम और विभागीय लापरवाही का नतीजा ज्यादा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हर साल बारिश आने का इंतजार सिर्फ इसलिए किया जाता है कि सड़कें और पुल फिर बह जाएं? यदि बारिश से पहले पुल-पुलियों के नीचे जमा मलबा, झाड़ियां और कचरा साफ कर दिया जाता, तो शायद आज यह स्थिति नहीं बनती। लेकिन विभाग की उदासीनता का खामियाजा एक बार फिर ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से इस मार्ग पर बनी छोटी पुलियाएं हर मानसून में जवाब दे देती हैं। शिकायतें होती हैं, अधिकारी निरीक्षण करते हैं, आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन स्थायी समाधान आज तक नहीं निकला। नतीजा यह है कि पहली ही बारिश में करोड़ों रुपये के विकास कार्य पानी में बह जाते हैं और ग्रामीणों की मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं।

दर्जनों गांवों पर संकट, मरीजों और छात्रों की बढ़ी परेशानी

पुलिया टूटने से दुल्ला, सारागांव, नवापारा, कोसमी, चुरकीदादर सहित आसपास के दर्जनों गांवों का आवागमन प्रभावित हो गया है। हजारों ग्रामीणों को अब ब्लॉक मुख्यालय पहुंचने के लिए लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ेगा। सबसे अधिक परेशानी मरीजों, गर्भवती महिलाओं, स्कूली छात्रों और रोजाना आने-जाने वाले लोगों को होगी। यदि किसी गांव में आपातकालीन स्थिति बनती है तो समय पर अस्पताल पहुंचना भी चुनौती बन सकता है।

छत्तीसगढ़-ओडिशा संपर्क भी प्रभावित

यह मार्ग केवल ग्रामीणों के लिए ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच संपर्क का भी महत्वपूर्ण रास्ता है। पुलिया क्षतिग्रस्त होने से दोनों राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों की आवाजाही प्रभावित हो गई है। व्यापार, खेती-किसानी और दैनिक जरूरतों से जुड़े लोग अब भारी परेशानी झेल रहे हैं।

हर साल वही हाल, फिर भी नहीं जागा विभाग

ग्रामीणों का कहना है कि हर मानसून में यही तस्वीर सामने आती है। छोटी पुलियाओं पर पानी का दबाव बढ़ते ही वे क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इसके बावजूद लोकनिर्माण विभाग ने कभी भी यहां उच्चस्तरीय पुल निर्माण की दिशा में गंभीर पहल नहीं की। यदि समय रहते मजबूत और ऊंचे पुल बनाए गए होते तो हर साल ग्रामीणों को इस संकट का सामना नहीं करना पड़ता।
लोगों का आरोप है कि विभाग बारिश से पहले केवल कागजी तैयारियां करता है, जबकि जमीनी स्तर पर न तो नालों की सफाई होती है और न ही पुल-पुलियों की तकनीकी जांच। यही कारण है कि पहली ही बारिश में व्यवस्था की पोल खुल जाती है।

ग्रामीणों में भारी नाराजगी, उठी जांच और जवाबदेही की मांग

घटना के बाद क्षेत्र में लोकनिर्माण विभाग के खिलाफ भारी नाराजगी है। ग्रामीणों ने मांग की है कि पुलिया टूटने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और पूरे मार्ग पर स्थित छोटी पुलियाओं के स्थान पर स्थायी एवं उच्चस्तरीय पुलों का निर्माण कराया जाए।

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही मार्ग बहाल नहीं किया गया और स्थायी समाधान नहीं निकाला गया तो क्षेत्रवासी आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—हर साल बारिश आएगी, सड़कें बहेंगी, लोग परेशान होंगे और विभाग सिर्फ निरीक्षण करता रहेगा… या फिर इस बार जिम्मेदारों पर कार्रवाई कर स्थायी

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