छुरा बीईओ के.एल. मतावले पर युक्तियुक्तकरण में वरिष्ठ को कनिष्ठ और कनिष्ठ को वरिष्ठ बताने के आरोप, कलेक्टर ने की थी अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा,संचालनालय ने मांगा था जवाब, लेकिन निष्कर्ष अब तक अधर मे

गरियाबंद। शिक्षा विभाग में शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण को लेकर सामने आया छुरा विकासखंड का मामला एक बार फिर गरमा गया है। मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि उपलब्ध शासकीय अभिलेखों के अनुसार तत्कालीन कलेक्टर ने तत्कालीन विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) छुरा के.एल. मतावले के विरुद्ध युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख करते हुए कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई एवं विभागीय जांच की अनुशंसा की थी। इसके बाद लोक शिक्षण संचालनालय ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए जिला शिक्षा अधिकारी से तथ्यात्मक प्रतिवेदन, संबंधित दस्तावेज और अभिमत मांगा।
मामले में विभागीय जांच भी कराई गई। इसके बावजूद लंबे समय बाद तक कार्रवाई के अंतिम परिणाम को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर कलेक्टर की अनुशंसा, संचालनालय के निर्देश और जांच के बाद भी कार्रवाई किस स्तर पर अटकी हुई है?
युक्तियुक्तकरण में वरिष्ठ को कनिष्ठ और कनिष्ठ को वरिष्ठ बताने का आरोप
वर्ष 2025 में शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण के दौरान छात्र संख्या के आधार पर शिक्षकों के समायोजन की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसके लिए विकासखंड और जिला स्तर पर समितियों का गठन किया गया था। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार इसी प्रक्रिया में छुरा विकासखंड से भेजी गई जानकारी को लेकर गंभीर आपत्तियां सामने आईं।
वर्तमान जिला शिक्षा अधिकारी राजेश चंद्राकर द्वारा उपलब्ध कराए गए अभिलेखों के आधार पर बताया गया कि कुछ मामलों में शिक्षकों की वरिष्ठता संबंधी जानकारी में कथित त्रुटियां पाई गईं। आरोप है कि कुछ मामलों में वरिष्ठ शिक्षकों को कनिष्ठ तथा कनिष्ठ शिक्षकों को वरिष्ठ दर्शाकर सूची तैयार कर भेजी गई, जिसके कारण युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया में विवाद उत्पन्न हुआ।
इसके बाद प्रभावित शिक्षकों ने अपनी वास्तविक वरिष्ठता को लेकर आवेदन एवं अभ्यावेदन प्रस्तुत किए।

विषय शिक्षक को ही अतिशेष बताने का भी मामला

मामला केवल वरिष्ठता तक सीमित नहीं रहा। अभिलेखों के अनुसार कुछ शिक्षकों को ऐसे विषय का शिक्षक दर्शाकर अतिशेष घोषित किए जाने की बात भी सामने आई, जबकि वे संबंधित विषय के वास्तविक शिक्षक नहीं थे।
बाद में संबंधित दस्तावेजों में सुधार किए जाने के तथ्य भी सामने आए। इन तमाम बिंदुओं को लेकर तत्कालीन जिला प्रशासन के स्तर पर मामले की जांच और रिपोर्टिंग की गई।

कलेक्टर की रिपोर्ट में कार्रवाई की अनुशंसा

उपलब्ध शासकीय अभिलेखों के अनुसार तत्कालीन कलेक्टर ने युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया में सामने आई कथित अनियमितताओं को गंभीर मानते हुए बीईओ के विरुद्ध कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई तथा विभागीय जांच की अनुशंसा की थी।
रिपोर्ट में शासन के दिशा-निर्देशों की अनदेखी, शिक्षकों के समायोजन में नियमों के पालन में कमी, अतिरिक्त शिक्षकों की गणना में त्रुटियां तथा जिला स्तरीय समिति के समक्ष वास्तविक तथ्यों के स्थान पर भ्रामक जानकारी प्रस्तुत किए जाने जैसे बिंदुओं का उल्लेख किया गया था।
कलेक्टर के स्तर से मामले को गंभीर मानकर कार्रवाई की अनुशंसा किए जाने के बाद स्वाभाविक रूप से उम्मीद थी कि विभागीय स्तर पर शीघ्र निर्णय होगा। लेकिन मामला लंबा खिंचता चला गया।

संचालनालय ने भी मांगा था जवाब और दस्तावेज

कलेक्टर की अनुशंसा के बाद लोक शिक्षण संचालनालय, छत्तीसगढ़ ने भी जिला शिक्षा अधिकारी गरियाबंद को पत्र जारी कर मामले का तथ्यात्मक प्रतिवेदन, अभिमत और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
इससे यह स्पष्ट हुआ कि मामला केवल स्थानीय स्तर की शिकायत तक सीमित नहीं था, बल्कि उच्च विभागीय स्तर पर भी इसकी जानकारी पहुंच चुकी थी और संचालनालय ने भी मामले में रिपोर्ट तलब की थी।

पूर्व डीईओ के समय अटका रहा मामला, नए डीईओ ने भेजे दस्तावेज

जानकारी के अनुसार संचालनालय द्वारा मांगे गए प्रतिवेदन और दस्तावेज तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यकाल में नहीं भेजे जा सके। इसके चलते मामला लंबे समय तक लंबित रहा।
वर्तमान जिला शिक्षा अधिकारी राजेश चंद्राकर ने बताया कि उन्हें गरियाबंद में पदस्थ हुए लगभग एक माह ही हुआ है। मामला उनके संज्ञान में आने के बाद उन्होंने उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण कराया और 27 जुलाई 2026 को विस्तृत प्रतिवेदन, अभिमत एवं संबंधित दस्तावेज लोक शिक्षण संचालनालय को भेज दिए हैं।
डीईओ के अनुसार अब मामले में आगे की कार्रवाई सक्षम स्तर से की जानी है।

जांच हुई तो अंतिम रिपोर्ट कहां है?

सबसे बड़ा सवाल अब विभागीय जांच को लेकर उठ रहा है। यदि मामले में जांच कराई गई थी, तो उसकी अंतिम रिपोर्ट क्या कहती है? क्या जांच में आरोप सही पाए गए या अधिकारी को दोषमुक्त किया गया?
यदि जांच में आरोप प्रमाणित नहीं हुए हैं तो संबंधित अधिकारी को दोषमुक्त करने वाला आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ?
और यदि जांच में अनियमितताएं प्रमाणित हुई हैं तो अब तक अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

यही सवाल अब शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

क्या फाइलों में दब गया युक्तियुक्तकरण का मामला?

कलेक्टर की रिपोर्ट, संचालनालय का पत्र, शिक्षकों की शिकायतें, जांच और फिर लंबे समय तक कार्रवाई का इंतजार—पूरे घटनाक्रम ने कई सवालों को जन्म दे दिया है।
क्या युक्तियुक्तकरण की कथित गड़बड़ियों की फाइल कार्रवाई की प्रतीक्षा में दब गई?
क्या जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई करने में विभागीय स्तर पर देरी हुई?
क्या जांच के बाद भी अंतिम निर्णय जानबूझकर लंबित रखा गया?
या फिर जांच में अधिकारी को दोषमुक्त कर दिया गया है और इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई?
इन सभी सवालों का स्पष्ट जवाब अब शासन और लोक शिक्षण संचालनालय से अपेक्षित है।
शिक्षकों की शिकायत के बाद उठा था मामला
बताया जाता है कि युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया में वरिष्ठता और विषय संबंधी जानकारी को लेकर शिक्षकों द्वारा शिकायत एवं अभ्यावेदन प्रस्तुत किए गए थे। शिकायतों के बाद मामले की जांच हुई और इसी क्रम में प्रशासनिक स्तर पर कई गंभीर बिंदु सामने आए।
शिक्षकों का सवाल है कि यदि पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत हुई थी तो इतनी शिकायतें क्यों सामने आईं? और यदि दस्तावेजों में गलतियां पाई गईं तथा बाद में उनमें सुधार किया गया, तो इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय की गई?
अब गेंद शासन के पाले में
वर्तमान डीईओ द्वारा 27 जुलाई को समस्त दस्तावेज और विस्तृत प्रतिवेदन संचालनालय को भेजे जाने के बाद अब मामला फिर से शासन स्तर पर पहुंच गया है।
ऐसे में अब निगाहें लोक शिक्षण संचालनालय के अगले कदम पर टिकी हैं।
कलेक्टर की अनुशंसा पर क्या कार्रवाई होगी?
विभागीय जांच का अंतिम निष्कर्ष क्या है?
युक्तियुक्तकरण में वरिष्ठ-कनिष्ठ की जानकारी में कथित गड़बड़ी के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—यदि अनियमितताएं प्रमाणित हुई थीं तो कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई?
जनता और शिक्षकों को चाहिए साफ जवाब
यह मामला केवल एक बीईओ या कुछ शिक्षकों के समायोजन तक सीमित नहीं है। यह सरकारी प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमों के पालन से जुड़ा विषय है।
यदि उपलब्ध शासकीय दस्तावेजों में दर्ज आरोप जांच में सही पाए गए हैं तो दोषी के विरुद्ध कार्रवाई होना चाहिए। वहीं यदि आरोप प्रमाणित नहीं हुए हैं तो संबंधित अधिकारी को दोषमुक्त किए जाने की स्थिति भी स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि गलती किससे हुई—सवाल यह भी है कि गलती सामने आने के बाद जिम्मेदारी तय क्यों नहीं हुई?
कलेक्टर की अनुशंसा से लेकर संचालनालय के निर्देश और जांच तक पहुंच चुके इस मामले का अंतिम फैसला आखिर कब होगा?
छुरा के युक्तियुक्तकरण मामले में अब शासन को फाइल नहीं, जवाब देना होगा।

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