13 महीने की मजदूरी बकाया, ऊपर से 15 दिन का इंतजार! कलेक्टर के सामने गिड़गिड़ाई पीड़ित महिला, बोली—काम कराया तो मेहनताना क्यों नहीं?,विशेष पिछड़ी जनजाति की महिला ने लगाई न्याय की गुहार..तत्कालीन सहायक आयुक्त के कार्यकाल में करीब 100 कर्मचारियों को हटाने का भी आरोप।
संवाददाता – अनीश सोलंकी
गरियाबंद। सरकारी व्यवस्था में मजदूरों को समय पर मेहनताना दिलाने के दावों के बीच गरियाबंद जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें एक महिला अपनी मेहनत की कमाई के लिए महीनों से परेशान होने का आरोप लगा रही है। विशेष पिछड़ी जनजाति की महिला श्रीमती राजकुमारी यादव ने 13 महीने की कथित बकाया मजदूरी का भुगतान नहीं होने की शिकायत कलेक्टर के समक्ष रखी। महिला का कहना है कि उसने काम किया, लेकिन मेहनताने के लिए उसे बार-बार अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। परिवार के भरण-पोषण की चिंता के बीच अब उसे प्रशासन से न्याय मिलने की उम्मीद है।
मामले की गंभीरता तब सामने आई, जब कलेक्टर रणवीर शर्मा ने मौके पर ही सहायक आयुक्त आदिवासी विकास लोकेश्वर पटेल को बुलाकर आवेदन का निराकरण करने के निर्देश दिए। पीड़ित महिला के मुताबिक, इस दौरान सहायक आयुक्त ने बजट उपलब्ध नहीं होने की बात कहते हुए उसे 15 दिन बाद आने के लिए कहा। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब महिला से काम लिया गया, तो उसके मेहनताने के भुगतान की व्यवस्था समय पर क्यों नहीं हो सकी? क्या अब भी उसे अपनी ही कमाई के लिए इंतजार करना पड़ेगा?
काम के बदले मजदूरी नहीं मिलने का आरोप, परिवार पर आर्थिक संकट
कलेक्टर को सौंपे गए आवेदन के अनुसार, राजकुमारी यादव विशेष पिछड़ी जनजाति आवासीय विद्यालय, दरपशा स्थित प्री-मैट्रिक कन्या छात्रावास में दैनिक मजदूरी के आधार पर काम करती थीं। आवेदन में उनके कार्यकाल को लेकर 27 जुलाई 2022 से कार्यरत होने का उल्लेख है, जबकि एक अन्य विवरण में 6 जुलाई 2024 से काम शुरू करने और 27 जनवरी 2026 तक कार्य करने की बात कही गई है।
महिला ने आरोप लगाया है कि काम करने के बावजूद उसे करीब 13 महीने की मजदूरी का भुगतान नहीं किया गया। हालांकि, बकाया राशि कितनी है, किन महीनों का भुगतान लंबित है और भुगतान अटकने का आधिकारिक कारण क्या है, इसकी पुष्टि संबंधित विभाग के अभिलेखों से होना बाकी है।
महिला का कहना है कि वह आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से है और मजदूरी उसके परिवार की आजीविका का महत्वपूर्ण सहारा है। ऐसे में लंबे समय तक मेहनताना नहीं मिलने से घर चलाने और बच्चों के भरण-पोषण में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उसका सवाल है कि जब काम लिया गया, तो उसकी मजदूरी के लिए उसे बार-बार गुहार क्यों लगानी पड़ रही है?
तत्कालीन सहायक आयुक्त नवीन भगत पर करीब 100 कर्मचारियों को हटाने का आरोप
इस मामले में महिलाओं ने तत्कालीन सहायक आयुक्त आदिवासी विकास नवीन भगत के कार्यकाल को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उस दौरान करीब 100 लोगों को बिना कोई स्पष्ट कारण बताए नौकरी से हटा दिया गया और उनके स्थान पर नए लोगों की भर्ती कर ली गई। आरोप है कि काम करने वाले पुराने कर्मचारियों की मेहनत की राशि का भुगतान भी नहीं किया गया।
यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह केवल मजदूरी भुगतान का मामला नहीं रहेगा, बल्कि संबंधित नियुक्तियों, कर्मचारियों को हटाने की प्रक्रिया और लंबित देनदारियों की जांच का विषय भी बनेगा। हालांकि, कर्मचारियों की संख्या, सेवा समाप्ति के कारणों और भुगतान की स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है। इस संबंध में संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना भी जरूरी है।
कलेक्टर के निर्देश के बाद भी 15 दिन का इंतजार!*
पीड़ित महिला को अब कलेक्टर रणवीर शर्मा के हस्तक्षेप से समाधान की उम्मीद है। महिला के अनुसार, कलेक्टर ने शिकायत सुनने के बाद सहायक आयुक्त लोकेश्वर पटेल को तत्काल बुलाया और आवेदन का निराकरण करने के निर्देश दिए। इसके बाद बजट उपलब्ध नहीं होने की बात कहकर 15 दिन बाद आने के लिए कहे जाने से महिला की परेशानी कम होने के बजाय इंतजार और बढ़ गया है।
यहां बड़ा सवाल यह है कि यदि बजट की कमी ही भुगतान में देरी की वजह है, तो क्या विभाग ने बकाया मजदूरी का आकलन कर भुगतान के लिए कोई प्रस्ताव भेजा है? क्या महिला को उसके कार्यकाल और बकाया राशि की लिखित जानकारी दी गई है? और यदि भुगतान लंबित है, तो उसके निराकरण की निश्चित समय-सीमा क्या है?
सिर्फ अगली तारीख मिलने से किसी जरूरतमंद श्रमिक की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि बकाया मजदूरी का सत्यापन कब होगा और पात्र पाए जाने पर भुगतान किस समय तक किया जाएगा।
मेहनत का हक आखिर कब मिलेगा?
विशेष पिछड़ी जनजाति की महिला की यह शिकायत प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है। यदि किसी कर्मचारी से काम लिया गया है और अभिलेखों से उसका बकाया भुगतान प्रमाणित होता है, तो नियमानुसार भुगतान सुनिश्चित करना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है।
अब निगाहें कलेक्टर रणवीर शर्मा के निर्देशों के बाद होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं। वहीं तत्कालीन सहायक आयुक्त नवीन भगत के कार्यकाल में कर्मचारियों को हटाने और भुगतान लंबित रहने के आरोपों पर भी विभागीय स्पष्टीकरण जरूरी है। वर्तमान सहायक आयुक्त लोकेश्वर पटेल के सामने चुनौती है कि शिकायत की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें और नियमानुसार पात्र हितग्राही को उसका हक दिलाने की दिशा में ठोस कार्रवाई करें।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जिस महिला ने मेहनत करके काम किया, उसे अपनी मजदूरी पाने के लिए आखिर कब तक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ेंगे?*
