तिरपाल के भरोसे चल रहा करोड़ों की योजनाओं का दफ्तर! जिस मनरेगा पर गांवों के विकास की जिम्मेदारी, उसका अपना कार्यालय बदहाल; जर्जर छत बनी हादसे का इंतजार, बारिश में खतरे के साये में कर्मचारी और दस्तावेज

छुरा । महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के माध्यम से गांवों में रोजगार सृजित करने, करोड़ों रुपये के विकास कार्यों की निगरानी करने और पंचायतों में विकास की रफ्तार तय करने वाला छुरा स्थित मनरेगा कार्यालय आज खुद बदहाली की तस्वीर बन चुका है। हालात ऐसे हैं कि वर्षों पुराने इस भवन की जर्जर खपरैल छत अब पूरी तरह जवाब दे चुकी है और पूरा कार्यालय तिरपाल (झिल्ली) के सहारे संचालित हो रहा है। बरसात के मौसम में यह भवन किसी भी समय बड़े हादसे को न्योता देता नजर आ रहा है।
लगातार हो रही बारिश ने कार्यालय की वास्तविक स्थिति उजागर कर दी है। भवन की खपरैल कई जगहों से टूट चुकी है, छत पर काई और घास उग आई है, जिससे स्पष्ट है कि लंबे समय से इसकी मरम्मत नहीं हुई। बारिश का पानी कार्यालय के भीतर न टपके, इसके लिए पूरी छत पर बड़ी तिरपाल डालकर किसी तरह काम चलाया जा रहा है। लेकिन यह व्यवस्था केवल अस्थायी राहत है, स्थायी समाधान नहीं।
रोज सैकड़ों लोगों की आवाजाही, फिर भी सुरक्षा भगवान भरोसे
मनरेगा कार्यालय में प्रतिदिन ग्रामीण, सरपंच, पंच, सचिव, रोजगार सहायक, तकनीकी सहायक और कर्मचारी विभिन्न कार्यों के लिए पहुंचते हैं। मजदूरों के भुगतान, मस्टर रोल, तकनीकी स्वीकृति, विकास कार्यों की फाइलें और करोड़ों रुपये की योजनाओं से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज इसी कार्यालय में सुरक्षित रखे जाते हैं। लेकिन भवन की जर्जर स्थिति के कारण हर बारिश में इन रिकॉर्ड के खराब होने का खतरा बना रहता है।
कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि तेज बारिश या आंधी के दौरान छत का कोई हिस्सा अचानक भरभराकर गिर गया तो कर्मचारियों और कार्यालय में मौजूद ग्रामीणों की जान जोखिम में पड़ सकती है। इसके बावजूद अब तक न तो भवन की मरम्मत की दिशा में कोई ठोस पहल हुई है और न ही नए कार्यालय भवन के निर्माण को लेकर कोई गंभीर कदम उठाया गया है।
सरकारी दावों पर उठ रहे सवाल
सरकार ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, लेकिन विडंबना यह है कि उन्हीं योजनाओं की मॉनिटरिंग करने वाला मनरेगा कार्यालय खुद बदहाल स्थिति में पहुंच चुका है। यह दृश्य सरकारी व्यवस्थाओं की प्राथमिकताओं पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। वर्षों पुराने इस भवन की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है, फिर भी जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता बनी हुई है।
तिरपाल के नीचे चल रहा सरकारी कामकाज
बरसात के बीच तिरपाल के सहारे कार्यालय का संचालन इस बात का संकेत है कि भवन अब अपनी उपयोगिता और सुरक्षा दोनों खो चुका है। कर्मचारी मजबूरी में इसी भवन में कार्य करने को विवश हैं। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में कोई बड़ी दुर्घटना होने से इनकार नहीं किया जा सकता।
ग्रामीणों की मांग – नया भवन बने या तत्काल हो जीर्णोद्धार
क्षेत्र के नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि छुरा स्थित मनरेगा कार्यालय के लिए शीघ्र नया भवन स्वीकृत किया जाए अथवा वर्तमान भवन का तत्काल जीर्णोद्धार कराया जाए, ताकि कर्मचारियों को सुरक्षित कार्यस्थल मिले और आम जनता को भी निर्भय होकर सरकारी सेवाएं प्राप्त हो सकें।
सबसे बड़ा सवाल…
जो कार्यालय गांवों में रोजगार, सड़क, तालाब और विकास की इबारत लिखता है, अगर वही तिरपाल के सहारे सांस ले रहा हो, तो आखिर ग्रामीण विकास की तस्वीर कितनी मजबूत मानी जाए? क्या जिम्मेदार अधिकारी किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं?
