दो माह के राशन की एंट्री, लेकिन मिला सिर्फ एक माह का चावल… सैकड़ों महिलाओं ने खोली पोल, मीडिया पहुंची तो मचा हड़कंप, अब करोड़ों की पीडीएस व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल

छुरा। गरीबों के लिए सरकार मुफ्त राशन योजना चला रही है ताकि कोई परिवार भूखा न सोए। लेकिन यदि उसी योजना में सेंध लग जाए और गरीबों के हिस्से का अनाज बीच रास्ते में ही गायब होने लगे, तो यह केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि गरीबों के अधिकारों पर सीधा हमला माना जाएगा।
छुरा विकासखंड के ग्राम पंचायत कोठीगांव में मंगलवार को ठीक ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां सरकारी राशन दुकान में महिलाओं के हंगामे ने कथित तौर पर पीडीएस व्यवस्था की गंभीर अनियमितताओं को उजागर कर दिया।
राशन वितरण के दौरान पहले तो सब कुछ सामान्य दिख रहा था। हितग्राही अपने-अपने राशन कार्ड लेकर कतार में खड़े थे और मशीन पर अंगूठा लगाकर राशन ले रहे थे। लेकिन कुछ ही देर बाद महिलाओं को उस समय शक हुआ जब राशन कार्ड में मई और जून दोनों माह के राशन की एंट्री की जा रही थी, जबकि चावल सिर्फ जून माह का दिया जा रहा था। महिलाओं ने तुरंत सवाल उठाए कि मई माह का चावल आखिर कहां गया?
“मई में सिर्फ चना और शक्कर मिली थी, चावल नहीं”
महिला हितग्राहियों ने आरोप लगाया कि मई माह में उन्हें केवल चना और शक्कर वितरित की गई थी। चावल नहीं दिया गया था। इसलिए जून में उन्हें दोनों माह का चावल मिलना चाहिए था। लेकिन जब राशन कार्ड में दोनों माह का पूरा वितरण दर्ज किया जाने लगा और हाथ में केवल एक माह का चावल दिया गया, तब महिलाओं का गुस्सा फूट पड़ा।
कुछ ही देर में राशन दुकान के बाहर सैकड़ों महिलाएं इकट्ठा हो गईं। एक-एक कर सभी महिलाओं ने एक ही बात दोहराई—”हमसे अंगूठा लगवाकर दो माह का राशन दिखाया जा रहा है, जबकि चावल सिर्फ एक माह का दिया जा रहा है।”
मीडिया पहुंची तो बढ़ा दबाव
महिलाओं ने मौके पर मौजूद मीडिया को बुलाया। मीडिया द्वारा सवाल पूछे जाने पर राशन दुकान के सेल्समेन रामसिंह मरकाम ने शुरुआत में कहा कि पूरा राशन पहले ही वितरित किया जा चुका है। लेकिन वहां मौजूद महिलाओं ने इस दावे का जोरदार विरोध किया और कहा कि मई माह में चावल मिला ही नहीं।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार महिलाओं के लगातार विरोध और सवालों के बीच सेल्समेन ने कहा कि हितग्राहियों को मई माह का चावल दे दिया जाएगा। इस कथन की पुष्टि संबंधित विभागीय जांच से होना शेष है।
अब उठ रहे हैं कई बड़े सवाल
यदि महिलाओं के आरोप सही हैं, तो यह मामला बेहद गंभीर हो सकता है।
सरकार द्वारा भेजा गया मई माह का चावल कहां गया?
यदि चावल वितरित नहीं हुआ था, तो राशन कार्ड में उसकी एंट्री क्यों की गई?
क्या बिना पूरा राशन दिए ही रिकॉर्ड में वितरण पूरा दिखाया गया?
क्या ऐसे और भी हितग्राही हैं जिनके साथ यही हुआ?
यही वे सवाल हैं जिनका जवाब अब खाद्य विभाग और जिला प्रशासन को देना होगा।
गरीबों का हक, सिस्टम की साख और जांच की जरूरत
ग्रामीणों का कहना है कि यदि महिलाएं आवाज नहीं उठातीं और मीडिया मौके पर नहीं पहुंचती, तो उन्हें शायद कभी मई माह का चावल नहीं मिलता। उनका आरोप है कि गरीब और अशिक्षित हितग्राही अक्सर रिकॉर्ड देखे बिना अंगूठा लगा देते हैं, जिसका गलत फायदा उठाया जा सकता है।
महिलाओं ने मांग की है कि राशन दुकान के स्टॉक रजिस्टर, वितरण रजिस्टर, ऑनलाइन पोर्टल की एंट्री, गोदाम से उठाव का रिकॉर्ड और हितग्राहियों के बयान की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता या गबन की पुष्टि होती है, तो संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
अब प्रशासन की परीक्षा
कोठीगांव का यह मामला केवल एक गांव तक सीमित नहीं रह गया है। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में पीडीएस व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और खाद्य विभाग पर टिकी हैं कि वे इस मामले की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाते हैं या नहीं। यदि जांच में महिलाओं के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह गरीबों के राशन में गंभीर अनियमितता का मामला बन सकता है और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की मांग और तेज हो सकती है।
