राजिम के पूर्व वन विभाग एसडीओ के सरकारी बंगले में 11 कर्मचारियों की कथित तैनाती; नियम, आदेश और खर्च पर उठे बड़े सवाल,,खाना बनाने से लेकर साफ-सफाई और बच्चों की देखरेख तक कर्मचारी लगाने के आरोप, अब विभागीय रिकॉर्ड से खुलेगा पूरा सच

रिपोर्टर :- अनीश सोलंकी
गरियाबंद/राजिम। सरकारी सेवा में अधिकारियों को शासन की ओर से सुविधाएं इसलिए उपलब्ध कराई जाती हैं, ताकि वे अपने दायित्वों का निर्वहन बेहतर तरीके से कर सकें। लेकिन गरियाबंद वन मंडल के राजिम में पदस्थ रहे पूर्व उप वनमंडलाधिकारी विकास चंद्राकर के कार्यकाल को लेकर सामने आ रही चर्चाओं ने सरकारी सुविधाओं के इस्तेमाल और कर्मचारियों की तैनाती पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आरोप है कि राजिम में पदस्थापना के दौरान सरकारी बंगले में अधिकारी की सेवा-सुविधा के लिए एक-दो नहीं, बल्कि कथित तौर पर करीब 11 कर्मचारी लगाए गए थे। दावा किया जा रहा है कि इन कर्मचारियों से खाना बनाने, साफ-सफाई सहित अलग-अलग घरेलू कार्य कराए जाते थे। यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो मामला केवल कर्मचारियों की संख्या तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी मानव संसाधन और सरकारी धन के कथित दुरुपयोग का गंभीर विषय बन सकता है।
‘साहब’ के सरकारी बंगले में 11 कर्मचारी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सरकारी बंगले में इतनी बड़ी संख्या में कर्मचारियों की तैनाती की आवश्यकता क्यों पड़ी?
क्या इन सभी कर्मचारियों को विभागीय कार्य के लिए अधिकृत रूप से तैनात किया गया था?
क्या इसके लिए सक्षम अधिकारी से लिखित अनुमति ली गई थी?
क्या कर्मचारियों की तैनाती का कोई आदेश जारी हुआ था?
क्या उनकी ड्यूटी सरकारी कार्यों में थी या सरकारी आवास की व्यक्तिगत सेवा-सुविधाओं में?
इन सवालों का जवाब यदि विभागीय रिकॉर्ड में मौजूद है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि पूरे मामले की वास्तविकता सामने आ सके।
खाना, सफाई और बच्चों की देखरेख तक के आरोप
वन विभाग से जुड़े एक कर्मचारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर दावा किया कि सरकारी बंगले में अलग-अलग कामों के लिए कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाती थी। आरोपों के अनुसार, खाना बनाने से लेकर साफ-सफाई और बच्चों की देखरेख जैसे कार्यों के लिए भी कर्मचारियों का इस्तेमाल किया जाता था।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए पूरे मामले की सच्चाई केवल ड्यूटी आदेश, उपस्थिति पंजी, वेतन भुगतान रिकॉर्ड और अधिकारियों के लिखित आदेशों की जांच से ही सामने आ सकती है।
सरकारी कर्मचारी किस काम के लिए थे? रिकॉर्ड खोले तो सामने आएगा सच
यदि 11 कर्मचारियों की तैनाती वास्तव में हुई थी, तो विभाग के पास इसका पूरा रिकॉर्ड होना चाहिए। कर्मचारियों के नाम, पद, तैनाती अवधि, ड्यूटी आदेश, उपस्थिति और वेतन भुगतान की जानकारी से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि कर्मचारी वास्तव में किस कार्य के लिए तैनात थे।
यही रिकॉर्ड यह भी बताएगा कि सरकारी खजाने से इन कर्मचारियों पर कितना खर्च हुआ।
यानी मामला सिर्फ 11 कर्मचारियों का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था में उनके इस्तेमाल और भुगतान की पूरी प्रक्रिया का है।
‘एक कर्मचारी’ के नियम की चर्चा, फिर 11 कैसे?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि सरकारी आवास पर सेवा के लिए निर्धारित संख्या में ही कर्मचारियों की व्यवस्था का प्रावधान रहता है। ऐसे में यदि कथित तौर पर 11 कर्मचारियों को एक अधिकारी के सरकारी बंगले पर लगाया गया था, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह व्यवस्था किस नियम और किस आदेश के तहत की गई?
यदि नियमों के तहत अतिरिक्त कर्मचारी लगाए गए थे तो आदेश सामने आना चाहिए।
और यदि बिना सक्षम अनुमति के ऐसा हुआ था तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
ट्रांसफर के बाद तेज हुई चर्चाएं
बताया जा रहा है कि अधिकारी के राजिम में पदस्थ रहने के दौरान अधीनस्थ कर्मचारी खुलकर इस विषय पर बोलने से बचते थे। अब स्थानांतरण के बाद सरकारी बंगले की कथित व्यवस्था को लेकर विभागीय हलकों में चर्चाएं होने की बात सामने आ रही है।
यदि यह केवल अफवाह है तो विभाग को रिकॉर्ड सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वहीं यदि आरोपों में सच्चाई है तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
सरकारी पैसा जनता का है, किसी की निजी सुविधा का नहीं
सरकारी कर्मचारी जनता के पैसे से वेतन प्राप्त करते हैं। इसलिए किसी अधिकारी की व्यक्तिगत सुविधा के लिए यदि सरकारी कर्मचारियों का इस्तेमाल किया गया हो तो यह बेहद गंभीर विषय है।
एक तरफ शासन प्रशासन में मितव्ययिता, पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ यदि किसी अधिकारी के सरकारी आवास पर जरूरत से कहीं अधिक कर्मचारी लगाए जाने की बात सामने आती है तो इसकी जांच होना जरूरी है।
जनता यह जानना चाहती है कि सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल नियमों के अनुसार हुआ या फिर किसी अधिकारी की निजी सुविधा के लिए?
अब जांच हुई तो खुलेंगे कई पन्ने
मामले की निष्पक्ष जांच के लिए संबंधित विभाग को राजिम में पूर्व एसडीओ के कार्यकाल के दौरान सरकारी बंगले पर तैनात कर्मचारियों की पूरी जानकारी जुटानी चाहिए। साथ ही—
कर्मचारियों की तैनाती के आदेश की जांच,
ड्यूटी चार्ट और उपस्थिति पंजी की जांच,
वेतन भुगतान एवं संबंधित मद की जांच,
सरकारी वाहन/संसाधनों के उपयोग की जांच,
कर्मचारियों से कराए गए कार्यों की जांच,
तथा सक्षम अधिकारी की अनुमति की जांच
की जानी चाहिए।
अगर जांच में नियम विरुद्ध तैनाती या सरकारी संसाधनों के निजी इस्तेमाल की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल—‘11 कर्मचारी’ किसके आदेश पर?
राजिम के सरकारी बंगले में कथित तौर पर 11 कर्मचारियों की तैनाती का मामला अब सिर्फ विभागीय गलियारों की चर्चा बनकर नहीं रहना चाहिए। यदि आरोप गलत हैं तो विभाग को रिकॉर्ड सामने रखकर स्थिति साफ करनी चाहिए और यदि आरोप सही हैं तो सरकारी धन एवं मानव संसाधन के इस्तेमाल का पूरा हिसाब जनता के सामने आना चाहिए।
क्योंकि सरकारी बंगला किसी अफसर की निजी रियासत नहीं और सरकारी कर्मचारी किसी की निजी सेवा के लिए नहीं होते। अब सवाल सीधा है—अगर 11 कर्मचारी तैनात थे, तो आखिर किसके आदेश पर और किस नियम के तहत?
जांच होगी तो सच सामने आएगा… और सच सामने आया तो जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।
