जल जीवन मिशन या सरकारी धन की बर्बादी? तीन साल में भी परसापानी की प्यास नहीं बुझा पाया विभाग, अधूरी टंकी और खराब नलकूप ने खोली पोल! घर-घर नल लगाने के नाम पर वाहवाही, लेकिन बूंदभर पानी नहीं! 10 दिनों से नलकूप भी बंद, आखिर किस काम की योजना और किस बात के जिम्मेदार अधिकारी? ग्रामीणों का दोटूक जवाब– पानी नहीं दे सकते तो उखाड़कर ले जाएं अपने नल!

 

संवाददाता – अनीश सोलंकी 

 

छुरा :- सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना का उद्देश्य हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना है, लेकिन छुरा विकासखंड के ग्राम परसापानी में इस योजना की जमीनी हकीकत सरकारी दावों को आईना दिखा रही है। यहां जल जीवन मिशन के नाम पर घरों में नल तो लगा दिए गए, पाइपलाइन भी बिछा दी गई, लेकिन तीन साल का लंबा अरसा बीत जाने के बाद भी ग्रामीणों के घरों तक पानी की एक बूंद नहीं पहुंच पाई। गांव में बनी पानी टंकी आज भी अधूरी पड़ी है और जिम्मेदार विभाग मानो इस अधूरे निर्माण को देखकर भी अनजान बना हुआ है। सवाल यह है कि जब पानी पहुंचाने की व्यवस्था ही पूरी नहीं करनी थी तो फिर लाखों रुपये खर्च कर नल और पाइपलाइन बिछाने का आखिर क्या औचित्य था?

 

तीन साल पहले जब परसापानी में जल जीवन मिशन का काम शुरू हुआ था, तब ग्रामीणों में उम्मीद जगी थी कि अब पानी के लिए होने वाली रोजाना की परेशानी से छुटकारा मिल जाएगा। महिलाओं को दूर-दूर तक पानी के लिए भटकना नहीं पड़ेगा और घर के आंगन में लगे नल से जरूरत का पानी मिल सकेगा। लेकिन ग्रामीणों की यह उम्मीद अब सरकारी व्यवस्था की लापरवाही के बीच दम तोड़ती नजर आ रही है। ठेकेदार ने पाइपलाइन बिछाने और घरों में नल कनेक्शन लगाने का काम तो कर दिया, लेकिन पानी टंकी का निर्माण अधूरा छोड़ दिया। इसके बाद न तो निर्माण कार्य को गति मिली और न ही योजना को चालू कराने के लिए कोई ठोस पहल दिखाई दी।

 

नल की टोंटी सूखी, सरकारी दावों की खुली पोल!

 

परसापानी में घरों के बाहर लगे नल आज जल जीवन मिशन की सफलता नहीं, बल्कि अधूरी व्यवस्था की कहानी बयां कर रहे हैं। जिन नलों से ग्रामीणों को पानी मिलना था, वे तीन साल से शोपीस बनकर रह गए हैं। ग्रामीणों के लिए यह दृश्य किसी मजाक से कम नहीं है। घर में नल मौजूद है, पाइपलाइन मौजूद है, लेकिन पानी नदारद है। आखिर विभाग ने किस आधार पर काम को पूर्ण माना? क्या सिर्फ नल लगा देने से हर घर जल का लक्ष्य पूरा हो जाता है? क्या अधिकारियों ने कभी गांव पहुंचकर यह देखने की जरूरत समझी कि जिन घरों में कनेक्शन दिए गए हैं, वहां वास्तव में पानी पहुंच भी रहा है या नहीं?

 

सरकार की योजनाओं का उद्देश्य कागजों पर आंकड़े बढ़ाना नहीं, बल्कि आम जनता को वास्तविक सुविधा उपलब्ध कराना होता है। लेकिन परसापानी में तीन साल बाद भी योजना का अधूरा रहना निर्माण एजेंसी और संबंधित विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

 

एक तरफ टंकी अधूरी, दूसरी तरफ नलकूप भी बंद; आखिर ग्रामीण पानी लाएं तो कहां से?

 

परसापानी में पेयजल संकट ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया, जब गांव का नलकूप भी पिछले 10 दिनों से खराब पड़ा है। एकमात्र सहारे के रूप में उपयोग किए जा रहे नलकूप के बंद होने से ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद जिम्मेदारों ने नलकूप की मरम्मत कराने की जहमत नहीं उठाई। जब जल जीवन मिशन की टंकी से पानी नहीं मिल रहा और नलकूप भी बंद पड़ा है, तो ग्रामीणों के सामने पेयजल की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती बन गया है।

 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार विभाग किसी बड़ी परेशानी या ग्रामीणों के आक्रोश का इंतजार कर रहा है? क्या पेयजल जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भी ग्रामीणों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ेंगे? आखिर शिकायतों के बाद भी नलकूप की मरम्मत क्यों नहीं कराई गई?

 

तीन साल में टंकी पूरी नहीं, फिर किस बात का विकास?

 

जल जीवन मिशन पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावों के बीच परसापानी की तस्वीर विभागीय निगरानी और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर रही है। तीन साल का समय किसी भी निर्माण कार्य को पूरा करने के लिए कम नहीं होता, फिर भी पानी टंकी अधूरी पड़ी है। यदि ठेकेदार ने काम अधूरा छोड़ा है तो उस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यदि निर्माण कार्य की निगरानी विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी है तो फिर अब तक इसकी जवाबदेही किसने तय की? आखिर किसकी उदासीनता के कारण ग्रामीणों को आज भी पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है?

 

योजना के नाम पर नल लगाकर जिम्मेदारी पूरी मान लेना जनता के साथ न्याय नहीं कहा जा सकता। विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि निर्माण कार्य कब पूरा होगा और ग्रामीणों को नियमित पेयजल कब उपलब्ध कराया जाएगा।

 

ग्रामीणों का सब्र टूटा, बोले– पानी दो या उखाड़कर ले जाओ अपने नल!

 

तीन साल से पानी का इंतजार कर रहे ग्रामीणों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। ग्रामीणों का कहना है कि घरों में लगे नलों को देखकर दिल जलता है। जिस सुविधा के लिए उम्मीद लगाई थी, वही आज परेशानी और निराशा का कारण बन गई है। ग्रामीणों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि यदि विभाग पानी उपलब्ध नहीं करा सकता तो घरों में लगाए गए नलों को उखाड़कर वापस ले जाए। कम से कम रोजाना सूखी टोंटी देखकर यह तो महसूस नहीं होगा कि पानी देने के नाम पर केवल दिखावा किया गया है।

 

ग्रामीणों की यह नाराजगी सिर्फ पानी की कमी को लेकर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के प्रति है, जिसने तीन साल बाद भी उनकी समस्या का समाधान नहीं किया।

 

अब विभाग से सीधे सवाल, जवाब कौन देगा?

 

* तीन साल बीतने के बाद भी पानी टंकी का निर्माण अधूरा क्यों है?

 

* पाइपलाइन और नल कनेक्शन लगाने के बाद योजना चालू क्यों नहीं हुई?

 

* निर्माण कार्य अधूरा छोड़ने वाले ठेकेदार पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?

 

* पिछले 10 दिनों से खराब पड़े नलकूप की मरम्मत क्यों नहीं कराई गई?

 

* क्या विभागीय अधिकारियों ने कभी मौके पर पहुंचकर योजना की वास्तविक स्थिति जांची?

 

* ग्रामीणों को नियमित पेयजल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी आखिर कौन निभाएगा?

 

परसापानी के ग्रामीणों को अब कागजी आश्वासन और सरकारी दावों से कोई सरोकार नहीं है। उन्हें अपने घरों में पानी चाहिए। विभाग को चाहिए कि अधूरी पानी टंकी का निर्माण तत्काल पूरा कराए, खराब नलकूप की मरम्मत कराए और जल जीवन मिशन को वास्तव में चालू कराए। अन्यथा परसापानी की यह तस्वीर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर एक बड़ा सवाल बनी रहेगी।

 

विडंबना देखिए, जिस योजना का नाम ही ‘जल जीवन मिशन’ है, उसी योजना के भरोसे बैठे ग्रामीण आज बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। सवाल सिर्फ परसापानी का नहीं, बल्कि उन जिम्मेदारों की जवाबदेही का है, जिनके कंधों पर ग्रामीणों तक पानी पहुंचाने की जिम्मेदारी है।

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