आज़ादी के 79 साल बाद भी अंधेरे में जी रही विशेष भुंजिया जनजाति, सड़क-बिजली-पानी तक नहीं… आखिर जिम्मेदार कौन?

सिकासार बांध बनने पर उजड़े थे परिवार, लेकिन पुनर्वास आज तक अधूरा… पहाड़ों पर बदहाल जिंदगी, बिना सड़क प्रसूता का इलाज मुश्किल, बच्चे बिना आंगनबाड़ी, कई के आधार कार्ड तक नहीं, सरकारी योजनाएं पहुंचने से पहले ही दम तोड़ रहीं।

गरियाबंद।एक तरफ सरकार विशेष पिछड़ी जनजातियों के उत्थान पर करोड़ों रुपये खर्च करने और अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ गरियाबंद जिले का सिकासार जलाशय क्षेत्र इन दावों की सच्चाई बयां करता दिखाई देता है। यहां पहाड़ों पर बसे विशेष पिछड़ी भुंजिया जनजाति के परिवार आज भी उसी तरह अभाव, बेबसी और उपेक्षा के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं, जैसे मानो विकास की रोशनी कभी इस इलाके तक पहुंची ही न हो।

सिकासार जलाशय क्षेत्र के पहाड़ों पर स्थित घोंटियादादर मोहल्ला आज भी सरकारी उपेक्षा की जीती-जागती तस्वीर बना हुआ है। यहां तक पहुंचने के लिए आज तक सड़क नहीं बन सकी। ग्रामीणों को राशन, इलाज, शिक्षा और दैनिक जरूरतों के लिए कई किलोमीटर तक ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों से पैदल सफर करना पड़ता है।

बरसात के दिनों में यह रास्ता जानलेवा बन जाता है और पूरा इलाका लगभग बाहरी दुनिया से कट जाता है।

अंधेरे में कटती है हर रात, पानी के लिए रोज संघर्ष

देश डिजिटल इंडिया और स्मार्ट गांव की बात कर रहा है, लेकिन घोंटियादादर में आज भी बिजली के खंभे तक नहीं पहुंचे हैं। सूर्य ढलते ही पूरा गांव अंधेरे में डूब जाता है। मोबाइल चार्ज करने तक के लिए लोगों को दूसरे गांवों का सहारा लेना पड़ता है। पीने के पानी की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। ग्रामीण झरनों और प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं, जिससे बरसात और गर्मी दोनों मौसम में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

बचपन भी बदहाल… आंगनबाड़ी नहीं, पोषण और शिक्षा से वंचित बच्चे

सरकार कुपोषण मुक्त भारत और मातृ-शिशु सुरक्षा की बात करती है, लेकिन इस बस्ती में आज तक एक आंगनबाड़ी केंद्र तक नहीं खुल सका। छोटे बच्चों को न समय पर पोषण आहार मिलता है और न ही प्रारंभिक शिक्षा। गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं को भी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। स्वास्थ्य सुविधा नहीं होने से मामूली बीमारी भी बड़ी मुसीबत बन जाती है।

उजड़े तो जरूर, लेकिन बसाए कभी नहीं गए

ग्रामीण बताते हैं कि उनके पूर्वज सिकासार जलाशय बनने से पहले बांध क्षेत्र के आसपास निवास करते थे। बांध निर्माण के दौरान उन्हें वहां से विस्थापित कर दिया गया, लेकिन उसके बाद पुनर्वास की कहानी अधूरी ही रह गई। वर्षों बीत गए, सरकारें बदलीं, योजनाएं आईं और करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे हुए, लेकिन इन परिवारों की तकदीर नहीं बदली। आज भी वे पहाड़ों पर बिना बुनियादी सुविधाओं के जिंदगी काट रहे हैं।

आधार नहीं, आवास नहीं… योजनाओं से भी दूर

हालात इतने खराब हैं कि बस्ती के कई बच्चों के आधार कार्ड तक नहीं बने हैं, जिसके कारण वे कई सरकारी योजनाओं के दायरे से बाहर हैं। पात्र परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ भी नहीं मिल पाया है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विशेष पिछड़ी जनजाति के नाम पर चल रही योजनाओं का लाभ किसे मिल रहा है?

बड़ा सवाल

घोंटियादादर की यह तस्वीर केवल एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो विकास के बड़े-बड़े दावे तो करती है, लेकिन सबसे जरूरतमंद लोगों तक बुनियादी सुविधाएं भी नहीं पहुंचा पाती। आखिर विशेष पिछड़ी भुंजिया जनजाति के ये परिवार कब तक सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन के लिए इंतजार करते रहेंगे? क्या प्रशासन इस बस्ती तक विकास पहुंचाएगा, या फिर यह दर्द भी सरकारी फाइलों और घोषणाओं में ही दबकर रह जाएगा?

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