गरियाबंद में सरपंच संघ के आंदोलन से छुरा उप-सरपंच संघ ने बनाई दूरी, बहिष्कार का ऐलान……स्वाभिमान से समझौता नहीं, सिर्फ भीड़ बढ़ाने के लिए गरियाबंद नहीं जाएंगे’; बिना सूचना और एजेंडे के आंदोलन में शामिल होने से साफ इनकार

संवाददाता – अनीश सोलंकी
छुरा/गरियाबंद। जिला मुख्यालय गरियाबंद में शासन-प्रशासन के खिलाफ सरपंच संघ द्वारा प्रस्तावित बड़े आंदोलन से ठीक पहले छुरा ब्लॉक में पंचायत प्रतिनिधियों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। छुरा उप-सरपंच संघ ने इस आंदोलन से दूरी बनाते हुए सामूहिक रूप से बहिष्कार का निर्णय लिया है। संघ के इस फैसले ने आंदोलन में पंचायत प्रतिनिधियों की एकजुटता और आपसी समन्वय को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है।उप-सरपंच संघ का साफ कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सम्मान और संवाद का अपना महत्व है। केवल भीड़ जुटाने या संख्या बल दिखाने के लिए उप-सरपंचों और पंचों का नाम आंदोलन में शामिल करना उचित नहीं है। जब आंदोलन के उद्देश्य, मांगों, कार्यक्रम स्थल और रणनीति की जानकारी तक नहीं दी गई, तो ऐसे आयोजन में शामिल होने का औचित्य ही क्या है?
बिना एजेंडे और आमंत्रण के आंदोलन में शामिल होने से इनकार
छुरा उप-सरपंच संघ के अध्यक्ष रुपनाथ बंजारे ने सरपंच संघ की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए कहा कि आंदोलन किसी एक व्यक्ति या संगठन का नहीं, बल्कि पंचायत प्रतिनिधियों के सामूहिक हितों का विषय होना चाहिए। इसके लिए सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को विश्वास में लेना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि अब तक सरपंच संघ के किसी जिम्मेदार पदाधिकारी की ओर से उन्हें औपचारिक रूप से न तो आमंत्रित किया गया है और न ही आंदोलन की कोई स्पष्ट जानकारी दी गई है। शासन-प्रशासन के खिलाफ किन मांगों को लेकर प्रदर्शन किया जा रहा है, आंदोलन का मुख्य एजेंडा क्या है और कार्यक्रम कहां आयोजित होगा, इसकी भी जानकारी नहीं है।
बंजारे ने दो टूक कहा कि उप-सरपंच और पंच केवल भीड़ बढ़ाने के लिए नहीं हैं। वे भी जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं और उनका भी अपना सम्मान तथा स्वाभिमान है। बिना सम्मानजनक संवाद और सहभागिता के किसी आंदोलन का हिस्सा बनना स्वीकार नहीं है।
पदाधिकारियों ने एकजुट होकर लिया बहिष्कार का फैसला
इस मामले में छुरा उप-सरपंच संघ के पदाधिकारियों ने भी अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए अध्यक्ष के निर्णय का समर्थन किया है। संघ के संरक्षक कैलाश साहू, लालबहादुर यादव एवं तिलक मरकाम, संयोजक व कोषाध्यक्ष कृष्णा पटेल, महामंत्री महेश साहू एवं बुधराम दीवान, मुख्य वक्ता रेखचंद साहू, सचिव टिकेंद्र साहू, संगठन मंत्री उर्मिला निषाद एवं बिशाखा बाई, सलाहकार खिरमनी हरपाल, अनसुईया यादव, भीखाराम सिन्हा एवं अमृत दीवान, रूपनारायण मांडले तथा उपाध्यक्ष जसप्रीत सहित अन्य पदाधिकारियों ने सामूहिक रूप से आंदोलन में शामिल नहीं होने का निर्णय लिया है।
पदाधिकारियों का कहना है कि त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में सरपंच के साथ उप-सरपंच और पंच भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं। गांव की समस्याओं और विकास कार्यों में उनकी सीधी भागीदारी होती है। ऐसे में किसी भी बड़े आंदोलन की रूपरेखा तैयार करते समय सभी प्रतिनिधियों को विश्वास में लेना संगठन की जिम्मेदारी है।
कुछ सरपंचों के व्यक्तिगत संपर्क, लेकिन संगठन स्तर पर संवाद नहीं
संघ के पदाधिकारियों के मुताबिक कुछ सरपंच व्यक्तिगत स्तर पर अपने-अपने उप-सरपंचों और पंचों से संपर्क जरूर कर रहे हैं, लेकिन सरपंच संघ के मुख्य पदाधिकारियों की ओर से अब तक कोई औपचारिक सूचना, बैठक या एजेंडा साझा नहीं किया गया है। संघ का कहना है कि व्यक्तिगत बुलावे और संगठनात्मक आमंत्रण में अंतर होता है। इतने महत्वपूर्ण आंदोलन में सभी की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शी संवाद जरूरी था।
आंदोलन से पहले ही संगठनात्मक समन्वय पर उठे सवाल
छुरा उप-सरपंच संघ के बहिष्कार के फैसले के बाद गरियाबंद में होने वाले सरपंच संघ के आंदोलन को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि उप-सरपंच संघ ने स्पष्ट किया है कि उसका विरोध किसी व्यक्तिगत व्यक्ति या पंचायत प्रतिनिधि से नहीं, बल्कि संवादहीनता और सम्मान की अनदेखी से है।
संघ का मानना है कि पंचायत प्रतिनिधियों के अधिकारों और समस्याओं को लेकर होने वाली किसी भी लड़ाई में सरपंच, उप-सरपंच और पंचों की समान भागीदारी होनी चाहिए। आपसी सम्मान, सकारात्मक सोच और संगठनात्मक समन्वय के बिना सामूहिक आंदोलन की कल्पना अधूरी है।
फिलहाल छुरा उप-सरपंच संघ के इस फैसले ने गरियाबंद के आंदोलन से पहले पंचायत प्रतिनिधियों के बीच आपसी तालमेल का मुद्दा केंद्र में ला दिया है। अब देखना होगा कि सरपंच संघ इस नाराजगी को दूर करने के लिए कोई पहल करता है या फिर छुरा ब्लॉक के उप-सरपंचों का बहिष्कार बरकरार रहता है।
