शौचालय के अभाव में झाड़ियों का सहारा ले रहे मासूम, मरम्मत के लिए स्वीकृत 45 हजार में से मिले सिर्फ 19 हजार!..जंगल से लगे परसापानी प्राथमिक शाला में बच्चों की सुरक्षा पर सवाल, जर्जर शौचालय की मरम्मत अधूरी; पूर्व सचिव ने कहा—बाकी राशि नहीं मिली, अब दूसरे पंचायत में हूं
संवाददाता – अनीश सोलंकी
छुरा :-आदिवासी विकासखंड के ग्राम पंचायत केवटीझर के आश्रित ग्राम परसापानी स्थित शासकीय प्राथमिक शाला में शौचालय की बदहाल स्थिति ने स्कूली बच्चों की परेशानी बढ़ा दी है। स्कूल में उपयोग योग्य शौचालय नहीं होने के कारण छोटे-छोटे बच्चों को शौच के लिए झाड़ियों का सहारा लेना पड़ रहा है। जंगल क्षेत्र से लगे स्कूल में यह स्थिति बच्चों की सुरक्षा, स्वच्छता और सम्मान से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा कर रही है। वहीं, शौचालय की मरम्मत के लिए स्वीकृत राशि और अधूरे कार्य को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। मामले में ग्राम पंचायत केवटीझर के तत्कालीन सचिव देवेंद्र कुमार से फोन पर चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि नए शौचालय निर्माण की स्वीकृति नहीं मिली थी, बल्कि पुराने शौचालय की मरम्मत के लिए 45 हजार रुपये स्वीकृत हुए थे। जनपद पंचायत की ओर से प्रथम किस्त के रूप में 19 हजार रुपये जारी किए गए थे, जिससे कुछ काम कराया गया था। उनके अनुसार, शेष राशि नहीं मिलने के कारण आगे का कार्य नहीं हो सका।
नए शौचालय की स्वीकृति नहीं, मरम्मत के लिए मिली थी राशि
परसापानी प्राथमिक शाला में शौचालय की सुविधा को लेकर सामने आई जानकारी ने मामले को नया मोड़ दे दिया है। जहां पहले नए शौचालय की स्वीकृति मिलने की बात कही जा रही थी, वहीं तत्कालीन पंचायत सचिव देवेंद्र कुमार ने स्पष्ट किया कि नए शौचालय के निर्माण के लिए नहीं, बल्कि पुराने शौचालय की मरम्मत के लिए 45 हजार रुपये की स्वीकृति मिली थी। इसमें से 19 हजार रुपये की पहली किस्त जारी हुई थी। सचिव के मुताबिक, इस राशि से कुछ मरम्मत कार्य कराया गया, लेकिन शेष राशि नहीं मिलने के कारण काम आगे नहीं बढ़ सका।
ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि मरम्मत के लिए स्वीकृत राशि का शेष भुगतान क्यों नहीं हुआ? पहली किस्त से कितना काम कराया गया और वर्तमान में शौचालय की स्थिति क्या है? इन बिंदुओं पर संबंधित जनपद पंचायत और शिक्षा विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
पूर्व सचिव बोले—अब दूसरे पंचायत में हूं, वर्तमान स्थिति की जानकारी नहीं
इस संबंध में तत्कालीन सचिव देवेंद्र कुमार ने फोन पर बताया कि शौचालय की मरम्मत के लिए 45 हजार रुपये स्वीकृत हुए थे। जनपद पंचायत से पहली किस्त के रूप में 19 हजार रुपये मिले थे, जिससे कुछ कार्य कराया गया था। बाकी राशि नहीं मिली। उन्होंने यह भी कहा कि अब वे उस पंचायत से हट चुके हैं, इसलिए वर्तमान में वहां क्या स्थिति है, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है।
पूर्व सचिव के इस बयान के बाद मरम्मत कार्य की वर्तमान स्थिति, खर्च की गई राशि और शेष भुगतान को लेकर संबंधित अधिकारियों से जानकारी लेना जरूरी हो गया है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि शौचालय की मरम्मत का कार्य कितना पूरा हुआ और यदि कार्य अधूरा है, तो उसे पूरा कराने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
जंगल से लगे स्कूल में झाड़ियों की ओर जाते बच्चे, पालकों को अनहोनी का डर
स्कूल परिसर में पुराना शौचालय जर्जर हालत में है। इसके कारण बच्चों को जरूरत पड़ने पर बाहर झाड़ियों की ओर जाना पड़ता है। पालकों का कहना है कि स्कूल जंगल क्षेत्र के नजदीक है और आसपास जंगली जानवरों की आवाजाही भी होती रहती है। ऐसे में छोटे बच्चों का अकेले झाड़ियों की ओर जाना चिंता का विषय है। पालकों को डर है कि कहीं किसी दिन कोई अप्रिय घटना न हो जाए।
बच्चों को सुरक्षित वातावरण में पढ़ाई करने का अवसर देना स्कूल प्रबंधन और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है। शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव में बच्चों को इस तरह परेशानी उठानी पड़े, तो व्यवस्था की जवाबदेही तय होना भी जरूरी है।
स्वीकृति और भुगतान के बीच उलझा मामला, जवाबदेही किसकी?
इस मामले में अब तीन प्रमुख सवाल सामने हैं—मरम्मत के लिए स्वीकृत 45 हजार रुपये में से शेष राशि अब तक क्यों जारी नहीं हुई? पहली किस्त के 19 हजार रुपये से कितना कार्य हुआ और उसका मूल्यांकन किसने किया? साथ ही, वर्तमान पंचायत सचिव, स्कूल प्रबंधन और संबंधित जनपद अधिकारियों ने अधूरे शौचालय की समस्या दूर करने के लिए क्या कदम उठाए हैं?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों से मिलना जरूरी है, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और जिम्मेदारी तय हो सके। केवल राशि स्वीकृत होने या पहली किस्त जारी होने से बच्चों की समस्या का समाधान नहीं हो जाता, जब तक शौचालय उपयोग योग्य न बन जाए।
बच्चों को कब मिलेगी शौचालय की सुविधा?
परसापानी प्राथमिक शाला की स्थिति को देखते हुए संबंधित जनपद पंचायत, ग्राम पंचायत और शिक्षा विभाग को तत्काल स्थल निरीक्षण कर शौचालय की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। मरम्मत कार्य, भुगतान और शेष राशि की जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जानी चाहिए। यदि पुराना शौचालय मरम्मत योग्य नहीं है, तो नियमानुसार वैकल्पिक व्यवस्था पर भी विचार किया जाना चाहिए।
स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को शौच के लिए झाड़ियों का सहारा लेना पड़े, यह स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रहनी चाहिए। अब देखना होगा कि संबंधित अधिकारी इस मामले में कब तक संज्ञान लेते हैं और परसापानी के बच्चों को सुरक्षित एवं उपयोग योग्य शौचालय की सुविधा कब तक उपलब्ध कराई जाती है।

