आस्था की आड़ में सरकारी जमीन पर कब्जे का ‘खेल’! मंदिर से शुरू हुआ कब्जे का सिलसिला अब सरकारी भवन तक पहुंचा—थारघाट की जमीन पर किसकी नजर?

संवाददाता – अनीश सोलंकी 

छुरा :- छुरा नगर से लगे थारघाट की बेशकीमती जमीन पर कथित अतिक्रमण का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। कभी बड़े झाड़ और जंगल से घिरे इस क्षेत्र में पहले एक मंदिर का निर्माण किया गया, इसके बाद अलग-अलग स्थानों पर कुछ दूरी के अंतराल में मूर्तियां स्थापित किए जाने की बात सामने आई। धीरे-धीरे आसपास की जमीन का उपयोग बढ़ता गया और अब खाली पड़ी जमीन पर भैंसों का तबेला तक बनाए जाने की बात कही जा रही है। इतना ही नहीं, नगर पंचायत द्वारा शासकीय राशि से बनाए जा रहे अधूरे शराब दुकान भवन पर भी कथित रूप से कब्जा किए जाने की स्थिति सामने आई है।

मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जिस स्थान पर देशी एवं अंग्रेजी शराब दुकान का निर्माण कराया जा रहा था, उस निर्माण कार्य को वन विभाग ने यह कहते हुए रोक दिया कि संबंधित जमीन वन विभाग की है। जानकारी के अनुसार शासकीय राशि से भवन का करीब 70 प्रतिशत निर्माण पूरा हो चुका था। वन विभाग की आपत्ति के बाद निर्माण कार्य अधर में लटक गया।

लेकिन सवाल यह है कि जब विभाग को जमीन की इतनी चिंता थी कि उसने सरकारी निर्माण तक रुकवा दिया, तो फिर उसी जमीन पर बढ़ते कथित अतिक्रमण पर उसकी निगाह क्यों नहीं पड़ी?

शासकीय निर्माण पर रोक लगी, फिर अतिक्रमण पर विभाग क्यों ‘सोता’ रहा?

थारघाट मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है। यदि जमीन वन विभाग की है और इसी आधार पर शासकीय राशि से बन रहे शराब दुकान के निर्माण को रोक दिया गया, तो उसी जमीन पर कथित रूप से मंदिर, मूर्तियां, तबेला और अस्थायी कब्जे बढ़ते जाने के दौरान संबंधित विभाग ने क्या कार्रवाई की?

सरकारी पैसे से बन रही इमारत दिखाई दे गई, लेकिन सरकारी जमीन पर बढ़ता कथित कब्जा क्यों दिखाई नहीं दिया?

यदि कोई व्यक्ति सरकारी अथवा वन भूमि पर कब्जा कर रहा है तो उसे रोकना और जमीन को सुरक्षित रखना भी संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है। ऐसे में थारघाट की स्थिति विभागीय निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

खंडित पड़ी मूर्तियां भी बयां कर रही हैं कब्जे की कहानी!

थारघाट की तस्वीर का एक और पहलू बेहद सवाल खड़े करने वाला है। क्षेत्र में खंडित अवस्था में पड़ी मूर्तियां भी अब पूरे मामले को लेकर कई सवाल खड़े कर रही हैं।

स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहा है कि यदि वास्तव में इन मूर्तियों की स्थापना गहरी धार्मिक आस्था और श्रद्धा के उद्देश्य से की गई थी, तो बाद में इनकी देखरेख और रखरखाव क्यों नहीं किया गया?

अगर मंदिर ही बनाना था तो अलग-अलग जगहों पर दूर-दूर मूर्तियां स्थापित करने की जरूरत क्यों पड़ी?

अगर वास्तव में आस्था थी तो भगवान की मूर्तियों के रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी थी?

मूर्तियां खंडित अवस्था में क्यों पड़ी हैं?

ये सवाल केवल धार्मिक भावना से जुड़े नहीं हैं, बल्कि यह भी सवाल उठाते हैं कि कहीं आस्था के नाम पर धीरे-धीरे जमीन के अलग-अलग हिस्सों को उपयोग में लेने का सिलसिला तो नहीं बढ़ता गया?

हालांकि इन सवालों का वास्तविक जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकता है, लेकिन मौके की स्थिति प्रशासन के लिए गंभीर जांच का विषय जरूर है।

आस्था के नाम पर जमीन का विस्तार या श्रद्धा? जांच से साफ हो तस्वीर

आस्था और धार्मिक भावनाओं का सम्मान जरूरी है, लेकिन किसी भी धार्मिक गतिविधि की आड़ में सरकारी या वन भूमि पर अनधिकृत कब्जे को उचित नहीं ठहराया जा सकता। यदि वास्तव में मंदिर निर्माण के उद्देश्य से मूर्तियां स्थापित की गई थीं, तो प्रशासन को यह भी देखना चाहिए कि इनकी स्थापना कब, किस स्थान पर और किसकी अनुमति से हुई।
वहीं यदि किसी प्रकार की अनुमति नहीं ली गई थी, तो संबंधित विभागों ने शुरुआत में ही कार्रवाई क्यों नहीं की?

यही वजह है कि थारघाट में खंडित पड़ी मूर्तियां अब खुद एक बड़ा सवाल बन गई हैं—जिस आस्था के नाम पर मूर्तियां स्थापित की गईं, उसी आस्था की निशानी आज उपेक्षित और खंडित हालत में क्यों पड़ी है?

मंदिर से तबेले तक… आखिर कब बढ़ता गया कब्जे का दायरा?

स्थानीय लोगों के अनुसार पहले मंदिर और मूर्ति स्थापना तक मामला सीमित दिखाई देता था। इसके बाद धीरे-धीरे आसपास की जमीन का उपयोग बढ़ता गया। अब खाली जमीन पर तबेला बनाए जाने की बात सामने आ रही है और अधूरे सरकारी भवन पर भी तिरपाल डालकर अस्थायी कब्जे की चर्चा है।

यदि यह सब सरकारी या वन भूमि पर हुआ है तो प्रशासन के लिए यह जांचना जरूरी हो जाता है कि कब्जे की शुरुआत कहां से हुई और उसका विस्तार कहां तक पहुंच गया।

क्योंकि अतिक्रमण अचानक बड़ा नहीं होता। पहले छोटी संरचना बनती है, फिर उसके आसपास जगह घिरती है और समय के साथ वही कब्जा बड़े क्षेत्र में फैल जाता है। थारघाट में भी यदि ऐसा हुआ है तो शुरुआत में कार्रवाई नहीं होना अब सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल है।

शराब दुकान का निर्माण रोका, लेकिन सरकारी जमीन की सुरक्षा कौन करेगा?

नगर पंचायत द्वारा शासकीय राशि से बनाए जा रहे शराब दुकान भवन का करीब 70 प्रतिशत निर्माण पूरा होने के बाद वन विभाग ने उसे रोक दिया। यदि भूमि वन विभाग की थी तो सरकारी निर्माण शुरू होने से पहले ही जमीन की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं हुई?

और जब विभाग को जानकारी हुई, तब निर्माण रोक दिया गया।

लेकिन इसके बाद सवाल और बड़ा है—जिस जमीन पर सरकारी निर्माण तक रोका गया, उसी जमीन पर कथित अतिक्रमण बढ़ता गया तो उसे रोकने के लिए क्या किया गया?

यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई तो आखिर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

अब सीमांकन और जांच से ही सामने आएगी पूरी सच्चाई
थारघाट की जमीन को लेकर अब राजस्व एवं वन विभाग की संयुक्त टीम से सीमांकन कराने की मांग उठ रही है। जमीन के रिकॉर्ड की जांच के साथ मौके की स्थिति का मिलान किया जाना जरूरी है। मंदिर, मूर्तियों, अधूरे सरकारी भवन, तबेले और अन्य कथित कब्जों की स्थिति भी जांच के दायरे में लाई जानी चाहिए।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि शराब दुकान का निर्माण किस भूमि पर स्वीकृत हुआ था, निर्माण पर वन विभाग ने किस आधार पर रोक लगाई और उसके बाद सरकारी जमीन की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए।

अब प्रशासन के सामने सिर्फ जमीन बचाने की नहीं, जवाबदेही तय करने की चुनौती

थारघाट की स्थिति अब कई सवाल एक साथ खड़े कर रही है। अगर जमीन सरकारी है तो कब्जा कैसे बढ़ा? अगर जमीन वन विभाग की है तो उसकी निगरानी कौन कर रहा था? अगर मूर्तियां आस्था के लिए स्थापित की गई थीं तो उनकी देखरेख क्यों नहीं हुई? और अगर सरकारी निर्माण जमीन के कारण रोकना पड़ा, तो उसी जमीन पर कथित अतिक्रमण क्यों नहीं रोका गया?

इन सवालों का जवाब अब शासन-प्रशासन को देना होगा।
आस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन सरकारी जमीन की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। थारघाट में खंडित पड़ी मूर्तियां, अधूरा सरकारी भवन और बढ़ता कथित अतिक्रमण अब प्रशासन से यही सवाल पूछ रहा है—आखिर कब जागेगा विभाग और कब होगी बेशकीमती सरकारी जमीन को बचाने के लिए ठोस कार्रवाई?

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